यूपीएससी तैयारी - विश्व एवं भारतीय भूगोल - व्याख्यान - 6

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भ्रंश, भू-संतुलन, पर्वत और भू-आकृति विकास भाग - 1

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1.0 पर्वतों की रचना 

पर्वत निर्मिति की प्रक्रिया एक अत्यंत विलक्षण भूगर्भीय प्रक्रियाओं में से एक है। ये प्रक्रियाएं पृथ्वी की भूपर्पटी (प्लेट विवर्तनिकी) की बडे़ पैमाने पर होने वाली गतिशीलता का परिणाम होती हैं। पर्वत निर्माण की जैविक प्रक्रिया में बलन, भ्रंशण, ज्वालामुखी गतिविधि, आग्नेय अतिक्रमण और रूपांतरण शामिल है। निहित विवर्तनिकी प्रक्रियाओं की दृष्टि से विशिष्ट भू-दृश्य की विशेषताओं के अध्ययन को विवर्तनिकी भू-आकृतिक विज्ञान कहते हैं, और भूगर्भीय युवा या निरंतर जारी रहने वाली प्रक्रियाओं के अध्ययन को नवविवर्तनिकी कहते हैं। 

पर्वत उन सीमाओं के निकट निर्मित होते हैं जहां विवर्तिनिकी प्लेटें एक दूसरे की दिशा में (अभिसरण सीमायें) गतिशील होती हैं। विवर्तनिकी प्लेटें एक दूसरे से टकराती हैं जिसके कारण विकृति निर्मित होती है, और पर्पटी गाढ़ी हो जाती है। इसका परिणाम पर्पटी के उत्थान और पर्वतों की निर्मिति में होता है। यह प्रक्रिया एक क्षैतिज संपीड़न होती है जिसका परिणाम अभिसरण प्लेट सीमाओं के निकट परतों के बलन और भ्रंशण में होता है। यह पर्पटी उत्थान एक पहाड़ी या पर्वत हो सकता है, जो निर्मिति की ढ़लान और ऊँचाई पर निर्भर होता है। परंतु पृथ्वी की सतह के वजन को संतुलित करने के लिए भी संपीड़ित चट्टान का काफी बड़ा भाग नीचे की ओर भी धकेला जाता है, जिसके कारण गहरी पर्वतीय जडें़ बन जाती हैं, जिससे ऊपरी और निचले, दोनों भागों के लिए पर्वतों की निर्मिति हो जाती है। 

लगभग 5.5 करोड़ वर्ष पूर्व ऐसे ही एक विशाल टकराव से एशिया का हिमालय पर्वत बना था। विश्व के सबसे ऊंचे पर्वतों में से तीस हिमालय में हैं। 29,035 फुट (8850 मीटर) ऊंचा माउंट एवेरेस्ट का शिखर पृथ्वी का सबसे ऊंचा बिंदु है। 

ऊपर से नीचे तक मापा गया सबसे लंबा पर्वत है मॉना किआ, जो प्रशांत महासागर में हवाई द्वीप पर स्थित एक निष्क्रिय ज्वालामुखी है। आधार से मापते हुए मौना किआ की लंबाई 33474 फुट (10,203 मीटर) है, हालांकि समुद्र से ऊपर यह केवल 13,796 फुट (4,205 मीटर) उभरा हुआ है।   

पर्वत भ्रंश रेखाओं के आसपास भी निर्मित हो सकते हैं। जब दो प्लेटें आपस में रगड़ती हैं तो पृथ्वी के भू-खण्डों का उत्थान होता है, जो झुके हुए होते हैं। कैलिफोर्निया में स्थित सिएरा नेवाड़ा पर्वत श्रृंखला इसका एक उदाहरण है। 

पर्वतों की निर्मिति की एक और प्रक्रिया यह है जब पृथ्वी की सतह के नीचे से मैग्मा को ऊपर की ओर धकेला जाता है, परंतु यह सतह फोड़ नहीं पाता। मैग्मा का यह उभार अंततः ठंड़ा हो जाता है और एक कठोर चट्टान के रूप में ठोस हो जाता है, जैसे ग्रेनाइट। मैग्मा के ऊपर के ऊपर की अपेक्षाकृत नरम परतें नष्ट हो जाती हैं और हमें दिखाई देता है एक गुंबद के आकार का पर्वत। यदि मैग्मा वास्तव में पृथ्वी की सतह से फट कर बाहर आता है, तो एक ज्वालामुखी निर्मित हो जाता है। लावा, राख और चट्टानों का नियमित विस्फोट एक ज्वालामुखी को बड़ी ऊँचाई तक निर्मित कर सकता है। वास्तव में विश्व के कुछ विशाल और ऊंचे पर्वत ज्वालामुखी ही हैं। उदाहरणार्थ, मॉना लोआ और मॉना किआ ज्वालामुखी के उदाहरण हैं। समुद्र तल के नीचे से मापे जाने पर, वास्तव में वे माउंट एवेरेस्ट से ऊंचे हैं। 

पर्वतों की निर्मिति का अंतिम प्रकार है अपक्षरण के माध्यम से। यदि एक ऊंचा पठार है, तो नदियां इसमें गहरी नालियां निर्मित करेंगी। अंततः नदी घाटियों में पर्वत हो सकते हैं।

1.1 पर्वतों के प्रकार 

1.1.1 वलित पर्वतः विश्व में पाये जाने वाले सबसे आम पर्वतों को वलित पर्वत (फोल्ड़ माऊंटेन) कहते हैं। वलित पर्वत अभिसरण या संपीड़न प्लेट सीमाओं के निकट पाये जाते हैं। जहां समुद्र का एक क्षेत्र दो प्लेटों को विभाजित करता है, तलछट समुद्र के तल में भू-अभिनति नामक अवसादों में जमा हो जाता है। धीरे-धीरे ये तलछट संपीड़ित होकर तलछट चट्टानें बन जाती है। एक बार फिर से जब दोनों प्लेटें एक दूसरे की ओर चलती हैं, तो समुद्र तल पर पड़ी तलछट मुड़ जाती है, और वलित हो जाती है। 

अंततः तलछट चट्टान समुद्र सतह से ऊपर वलित पर्वतों की श्रृंखला के रूप में निकल आती है। जहां चट्टानें ऊपर की ओर वलित होती हैं, उन्हें अपनति कहा जाता है। जहां चट्टानें नीचे की ओर वलित होती हैं उन्हें अभिनति कहा जाता है। गंभीर रूप से भृंश और वलित हुई चट्टानों को आवरण कहा जाता है।  

वलित पर्वत श्रृंखलाओं के कुछ उदाहरण हैं उत्तरी अमेरिका के रॉकी पर्वत और एशिया के हिमालय पर्वत। 

1.1.2 भ्रंश-खंड़ पर्वतः भ्रंश-खंड़ पर्वत (Fault-Block mountains) युवा भ्रंश रेखाओं से टूटी वलित चट्टान परतों से निर्मित होते है, जब वे खण्ड़ों के रूप में बन कर विभिन्न ऊंचाइयों पर ऊपर उठती हैं। आमतौर पर वे वलित क्षेत्रों के रूप में उठती हैं, जहां कभी पर्वत उभार हुए थे, जिन्होंने अपनी नमनीयता खो दी थी और जो अनाच्छादन के कारण सपाट हो गए थे। लगातार होने वाली विवर्तनिकी गतिविधियों के कारण पृथ्वी के केंद्र कुछ भाग वालन नहीं बनाते परंतु स्वतंत्र खण्ड़ों में टूट जाते हैं, जिनमें से कुछ होर्स्ट के रूप में उठते हैं और श्रृंखलाएँ बनाना शुरू कर देते हैं (‘‘पुनर्जीवित पर्वत‘‘), और कुछ अन्य ग्रबेंस के रूप में डूब जाते हैं, जो अवसादों की निर्मिति करते हैं। कई बार निरंतर होने वाली ओरोजेनी के कारण, पृथ्वी का चिकना हुआ भाग तहयुक्त विकृतियों के प्रभाव में आ जाता है, जिसके कारण विस्तृत और नरमी से ढ़लवां वलन बन जाते हैं, जिनके साथ भ्रंश भी होते हैं। वलित होने के बजाय, जैसे हमें वालन पर्वतों के साथ प्राप्त होते हैं, खंड़ पर्वत पुंजों में टूट जाते हैं और ऊपर या नीचे की ओर खिसकते हैं। भ्रंश खंड़ पर्वतों का आमतौर पर खड़ा अग्रभाग होता है, और पीछे की बाजू ढ़लवां होती है। 

भ्रंश खंड़ पर्वतों के उदाहरणों में सिएरा नेवाड़ा पर्वत शामिल हैं।

1.1.3 गुंबद पर्वत (Dome mountains) गुंबद पर्वतों की निर्मिति ज्वालामुखी के कारण होती है। पृथ्वी के अंतर्भाग में जमीन के नीचे पिघली हुई चट्टानें मैग्मा के एक बडे़ तालाब में आपस में सिकुड़ती हैं। चूंकि यह आसपास की चट्टानों की तुलना में कम घनी होती हैं अतः ये सतह तक अपना रास्ता बना लेती हैं। यदि यह मैग्मा सतह के साथ टकराता है तो उसका परिणाम एक ज्वालामुखी में होता है। परंतु यदि यह मैग्मा वास्तव में सतह के माध्यम से फटकर बाहर नहीं निकलता तो गुंबद पर्वतों की निर्मिति होती है। 

गुंबद पर्वत आमतौर पर उतने ऊंचे नहीं होते जितने वलित पर्वत होते हैं, क्योंकि अंदर का मैग्मा पर्याप्त बल के साथ नहीं धकेला जाता। लंबे समय के दौरान ठंड़ा हो जाता है और ठंड़ी, कठोर चट्टान बन जाता है। इसका परिणाम एक गुंबद के आकार के पर्वत में होता है। 

1.1.4 ज्वालामुखी पर्वतः ये पर्वत पृथ्वी के गहरे आतंरिक भाग की सामग्री के विशाल मात्रा में लावा या राख के रूप में निष्कासन के कारण निर्मित होते हैं। यह सामग्री ज्वालामुखी के छिद्र के आसपास जमा होती है और एकत्रित होकर पर्वतों का निर्माण करती है। विश्व के कुछ सबसे बडे़ पर्वत इसी प्रकार बने हुए हैं, जिनमें हवाई के बडे़ द्वीप पर बने मॉना लोआ और मॉना किआ पर्वत शामिल हैं। अन्य परिचित ज्वालामुखी हैं जापान का माउंट फूजी और अमेरिका का माउंट रेनियर। ज्वालामुखी पर्वत की निर्मिति का एक हाल का उदाहरण है 20 फरवरी 1943 का जब मेक्सिको के एक किसान के मक्के के खेत में अचानक विस्फोट होने लगे। दूसरे दिन तक शंकु 100 फुट (30.5 मीटर) की ऊँचाई तक बन गया था। दो हफ्तों में यह 450 फुट (137 मीटर) ऊंचा हो गया था, और 1952 में जब अंततः विस्फोट समाप्त हुए तब तक शंकु 1,350 फुट (411 मीटर) ऊंचा बन गया था। आसपास के पेरिक्युटिन और परनगरीकुतिरो के गांव नए ज्वालामुखी से निकले मलबे के नीचे पूरी तरह से दब गए थे। लावा के प्रवाह छह मील तक फैले हुए थे और आसपास की मीलों दूर की संपूर्ण वनस्पति धूल और चट्टानों के कारण पूरी तरह से जलकर नष्ट हो गई थी। इस ज्वालामुखी को इसके द्वारा नष्ट हुए एक गांव पेरिक्यूटिन का नाम दिया गया था। 

1.1.5 प्रायद्वीपीय पर्वतः प्रायद्वीपीय पर्वत आतंरिक गतिविधि के कारण निर्मित नहीं होते। इसके बजाय ये पर्वत अपक्षरण के कारण निर्मित होते हैं। प्रायद्वीप विशाल समतल क्षेत्र होते हैं जो पृथ्वी के भीतर से बलपूर्वक ऊपर की ओर धकेले गए हैं, या ये लावा की परतों के कारण बनते हैं। प्रायद्वीपीय पर्वत तब बनते हैं जब बहता हुआ पानी क्षेत्र में गहरी नालियां निर्मित करता है, जिनके कारण पर्वत निर्मित होते हैं। आमतौर पर प्रायद्वीपीय पर्वत वलित पर्वतों के निकट पाये जाते हैं।

2.0 भू-आकृति 

भू-आकृतियां भूगर्भीय, जलवायु और जैविक बलों के बीच परस्पर प्रभाव का परिणाम होती हैं। इसके परिणामस्वरूप पृथ्वी की सतह में होने वाले परिवर्तनों को निम्नानुसार वर्गीकृत किया जा सकता है 

  1. दीर्घ अवधि के परिवर्तन (मनुष्य इन परिवर्तनों पर ध्यान दे पाने में असमर्थ है), और 
  2. अल्प अवधि के परिवर्तन। 

जो बल पृथ्वी की भूपर्पटी को प्रभावित करते हैं उन्हें मोटे तौर पर अंतर्जात बल और बहिर्जात बलों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। 

2.1 अंतर्जात शक्तियां (Endogenetic Forces)

जो शक्तियां पृथ्वी के अंदर से उत्पन्न होती हैं उन्हें अंतर्जात शक्तियां कहा जाता है। वे पृथ्वी में दो प्रकार की हलचल निर्मित करती हैं क्षैतिज हलचल और ऊर्ध्वाधर हलचल। ये बल अपनी ऊर्जा रेडियोधर्मिता, रासायनिक पुनर्मिश्रण, विस्तारण या संकुचन या पृथ्वी के अन्तर्भाग में वाले पिघले पदार्थों के विस्थापन जैसे परिवर्तनों से प्राप्त करते हैं। बलों के इस समूह को विवर्तनिकी बल भी कहा जा सकता है, जो पटल विरूपणी या ज्वालामुखीय प्रक्रियाओं के माध्यम से प्रकट होते हैं। 

पृथ्वी के अंदर बदलती जलीय स्थितियां और तापमान अंतर्जात बलों की निर्मिति के कारण होते हैं। संबंधित क्षैतिज या ऊर्द्धवाधर हलचलें चट्टानों के विस्तारण या संकुचन के कारण होती हैं। ज्वालामुखी विस्फोट और भूकंप-सूचक घटनाएँ भी अंतर्जात बलों की अभिव्यक्ति होती हैं। भूगर्भीय सामग्री का विस्थापन और पुनर्संयोजन कई बार इतनी तीव्र गति से होता है, कि पृथ्वी की हलचल भूपर्पटी के नीचे होती है। तीव्रता के आधार पर अंतर्जात बलों और हलचलों को आकस्मिक अंतर्जात बलों और पटल विरूपणी बलों में विभाजित किया जाता है। 

2.1.1 आकस्मिक बल 

पृथ्वी के गहरे अन्तर्भाग से आने वाले आकस्मिक अंतर्जात बलों के कारण निर्मित होने वाली हलचलों के कारण तीव्र और आकस्मिक घटनाएँ होती हैं, जिनका परिणाम पृथ्वी की सतह के नीचे और पृथ्वी की सतह पर भयंकर विनाश में होता है। ये बल बहुत तेजी से कार्य करते हैं, और उनके परिणाम कुछ मिनटों के अंदर ही देखे जा सकते हैं। ज्वालामुखी विस्फोट और भूकंप जैसी घटनाओं को ‘‘चरम घटनाएं‘‘ कहा जाता है, और जब ये घटनाएं घनी जनसंख्या वाले स्थानों में होती हैं तो काफी अधिक विनाशकारी खतरे बन जाती हैं। ये बल दीर्घकालीन तैयारियों का परिणाम होते हैं। पृथ्वी की सतह पर केवल उनके संचित प्रभाव की तेज गति के और आकस्मिक होते हैं। भू-गर्भ विज्ञान की दृष्टि से इन आकस्मिक बलों को ‘‘रचनात्मक बल‘‘ कहा जाता है क्योंकि ये पृथ्वी की सतह पर कुछ उभरी हुई नक्काशी विशेषतायें निर्मित करते हैं। उदाहरणार्थ, ज्वालामुखी विस्फोटों का परिणाम ज्वालामुखी शंकुओं और पर्वतों की निर्मिति में होता है, जबकि लावा के विदर प्रवाह व्यापक लावा पठारों और लावा मैदानों का निर्माण करते हैं। भूकंपों के कारण भ्रंश, दरारें और झीलें इत्यादि निर्मित होती हैं। 

2.1.2 पटल विरूपणी बल और हलचलें 

पटल विरूपणी बल बहुत ही धीमी गति से परिचालित होते हैं, और उनके प्रभाव हजारों, लाखों वर्षों के बाद दृष्टिगोचर होते हैं। इनमें क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर, दोनों प्रकार की हलचलें शामिल होती हैं, जिनके होने का कारण पृथ्वी एक अंदर गहराई में विद्यमान बल होते हैं। इन बलों को भी रचनात्मक बल कहा जाता है, ये पृथ्वी के विशाल क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं, और ये मेसो-स्तरीय उभार निर्मित करते हैं, जैसे पर्वत, मैदान, पठार, झीलें, विशाल भ्रंश इत्यादि। ये पटल विरूपणी बल और हलचलें आगे महादेशजनक हलचलों और पर्वत निर्माणकारी हलचलों में विभक्त होते हैं। 

महादेशजनक हलचलेंः इन हलचलों के क्रमशः ऊपर की ओर और नीचे की ओर की हलचलों के कारण महाद्वीप खण्ड़ों के उत्थान और अवतलन निर्मित होते हैं। ऊपर की ओर की हलचल के कारण महाद्वीपीय खण्ड़ों का दो प्रकार से उत्थान होता है - समूचे महाद्वीप या उसके किसी भाग का उत्थान और/या महाद्वीप की तटीय भूमि का उत्थान। इस प्रकार के उत्थान को उद्गमन कहा जाता है। नीचे की दिशा की हलचल महाद्वीप पर दो प्रकार से अवतलन निर्मित करती है - भूक्षेत्र का अवतलन या वैकल्पिक रूप से समुद्र तट के निकट का भूक्षेत्र नीचे की ओर चला जाता है, या समुद्र स्तर से नीचे धसक जाता है, और इस प्रकार समुद्र के पानी में डूब जाता है। इस प्रकार के नीचे की दिशा की ओर की हलचल को निमज्जन कहा जाता है। 

पर्वत निर्माणकारी हलचलेंः पर्वत निर्माणकारी हलचलों का परिणाम पर्वतों की निर्मिति में होता है, जिनकी निर्मिति क्षैतिज रूप में कार्यरत अंतर्जात बलों के कारण होती है। क्षैतिज बल और उनसे निर्मित होने वाली हलचलों को ‘‘स्पर्शरेखा बल‘‘ भी कहा जाता है। ये बल दो प्रकार से कार्य करते हैं - तनाव बल के रूप में और संपीड़न बल के रूप में। तनाव बल विपरीत दिशा में कार्य करते हैं, और इस प्रकार पृथ्वी के भूपर्पटी भाग पर विदारण, दरार, चटकन और भ्रंशों का निर्माण करते हैं। इस प्रकार के बलों और हलचलों को फूटने वाले बल और हलचलें भी कहते हैं। संपीड़न बल एक दूसरे की दिशा में या आमने-सामने कार्य करते हैं और इनके कारण पर्पटी का नमन निर्मित होता है, जिनका परिणाम बलनों या पर्पटी के सबलन की निर्मिति में होता है, जिसके कारण पर्पटी के भागों पर स्थानीय उभार या अवतलन निर्मित होते हैं। इन्हें अभिसृत बल भी कहा जाता है। जब क्षैतिज बल आमने-सामने कार्य करते हैं, तो परिणामी संपीड़न या स्पर्शरेखा बलों के कारण पर्पटी की चट्टानें नम (मुड़) जाती हैं, और पर्पटी चट्टानें दो प्रकार से ‘‘पर्पटी नमन‘‘ की प्रक्रिया से गुजरती हैं - संवलन और वलन। 

भूपटलीय संवलन की प्रक्रिया भूपटल के बडे़ क्षेत्रों को प्रभावित करती है, जहां भूपटल के भाग या तो ऊपर की और संवलित हो जाते हैं या नीचे की ओर संवलित हो जाते हैं। संपीड़न बल के कारण भूपटलीय भाग के ऊपर की ओर के उभार, जिनका परिणाम अभिसृत क्षैतिज हलचल में होता है, उसे उत्संवलन कहते हैं जबकि भूपटलीय भागों के नीचे की दिशा में एक घाटी या अवसाद के रूप में नमन को अवसंवलन कहते हैं। जब उत्संवलन और अवसंवलन की प्रक्रिया बडे़ क्षेत्रों को प्रभावित करती है, तो परिणामी तंत्र को विस्तृत संवलन कहते हैं। जब पृथ्वी के अंतर्जात बल द्वारा क्षैतिज संचलन के कारण भूपटलीय चट्टानों में संपीड़न की स्थिति उत्पन्न होती है तो चट्टानों में लहरनुमा मोड़ पड़ जाते हैं, जिन्हें वलन कहा जाता है। 

भूपटलीय दरारों का संबंध तनावमूलक या संपीड़न बलों के क्षैतिज या ऊर्ध्वाधर दिशा में, या कभी-कभी दोनों दिशाओं में कार्यरत होने के कारण हुए चट्टानों के विस्थापन से होता है। भूपटलीय दरारें चट्टानों के सामर्थ्य और तनावमूलक बलों की तीव्रता पर निर्भर होती हैं। जब तनावमूलक बल मध्यम स्तर का होता है, तो चट्टानों में केवल दरारें पड़ती हैं, परंतु जब चट्टानों पर तीव्र तनावमूलक बल कार्य करता है तो चट्टानों के संपूर्ण विस्तार का विस्थापन हो जाता है, जिसका परिणाम भ्रंशों की निर्मिति में होता है। संधि और भ्रंश दो प्रमुख प्रकार की भूपटलीय दरारें होती हैं।

2.1.3 अवनति और अभिनति (Anticlines and Synclines) 

ऊपर की ओर मुडे़ हुए मेहराब जैसे भागों के वलनित चट्टान स्तर को ‘‘अवनति‘‘ कहते हैं, जबकि नीचे की ओर मुड़े हुए द्रोणिका जैसे भाग को ‘‘अभिनति‘‘ कहते हैं। बलन के दोनों भागों को बलन की भुजाएं कहते हैं। जो भुजा अवनति और उसके जोड़ीदार अभिनति के बीच साझा होती है उसे मध्य भुजा कहते हैं। अवनति की दोनों भुजाओं के बीच के कोण को द्विभाजित करने वाले समतलों या समान अभिनति की मध्य भुजा को बलन का अक्ष या अक्षीय समतल कहते हैं। अवनति या अभिनति के आधार पर इन अक्षीय समतलों को क्रमशः अवनति का अक्ष और अभिनति का अक्ष कहा जाता है। 

अवलनित चट्टान तलों को अवनति कहा जाता है। साधारण बलन में दोनों भुजाओं का चट्टान स्तर विपरीत दिशा में झुका होता है। कभी-कभी, बलन इतना विकट हो जाता है कि अवनति के नति का कोण दब जाता है, और बलन लगभग ऊर्ध्वाधर हो जाता है। जब अवनति की दोनों भुजाओं के ढ़ाल समान होते हैं तो ऐसे अवनति को सममित अवनति कहते हैं, परंतु जब ढ़ाल असमान होते हैं, तो ऐसी अवनति को असममित अवनति कहते हैं। नति के कोण के आधार पर अवनति को दो प्रकारों में विभाजित किया जाता है - जब नति का कोण 40 अंश से कम होता है, तो ऐसी अवनति को सौम्य अवनति कहते हैं, और जब नति का कोण 40 अंश और 90 अंश के बीच होता है तो ऐसी अवनति को खड़ी अवनति कहते हैं। 

क्षैतिज स्पर्शरेखा बलों द्वारा निर्मित संपीड़न बलों के कारण निर्मित नीचे की ओर अबलनित चट्टान तलों को अभिनति कहते हैं। ये द्रोणिका के आकार के होते हैं जिनमें दोनों ओर के चट्टान तल मध्य भाग की ओर ‘‘एक दूसरे की ओर झुके‘‘ होते हैं। यदि तीव्रता से बलित किया गया, जो अभिनति एक डोंगी का आकार ग्रहण कर लेते हैं।

2.1.4 एंटीक्लिनोरियम और सिंक्लिनोरियम (Anticlinorium and Synclinorium)

एंटीक्लिनोरियम का तात्पर्य वलित पर्वतों के क्षेत्रों की उन वलित संरचनाओं से है जहां छोटी-छोटी अवनति और अभिनति की अनेक श्रृंखलाएं और एक वृहद अवनति होती है। उनकी निर्मिति तब होती है जब क्षैतिज संपीड़न स्पर्शरेखा बल नियमित रूप से कार्य नहीं करते। इस प्रकार के वलन को पंखा वलन भी कहते हैं। 

सिंक्लिनोरियम ऐसी बलनित संरचनाओं का प्रतिनिधित्व करता है जिनमें एक वृहद अभिनति होती है और अनेक छोटी-छोटी अवनति और अभिनति की श्रृंखलाएं होती हैं, जिनकी निर्मिति अनियमित संपीड़न बलों के अनियमित वलन के कारण होती है। 

2.2 बलनों के प्रकार 

बलनों का स्वरुप विभिन्न कारकों पर निर्भर होता है, जैसे चट्टान का प्रकार, संपीड़न बलों का स्वरुप और उनकी तीव्रता, संपीड़न बलों के कार्य की अवधि इत्यादि। भुजाओं के झुकाव के आधार पर बलनों को पांच वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है - सममित बलन, असममित वलन, एकनत बलन, समनत बलन और परिबलन या शयान बलन। 

सममित बलनः यदि दोनों भुजाओं का झुकाव समान होता है, तो उन्हें सममित बलन कहते हैं। ये बलन खुले बलनों का उदाहरण होते हैं, और तब निर्मित होते हैं जब संपीड़न बल नियमित रूप से किंतु मध्यम तीव्रता के साथ कार्यरत होते हैं। 

असममित बलनः इस प्रकार के बलनों में एक भुजा दूसरी भुजा की अपेक्षा कम या अधिक, और भिन्न-भिन्न कोणों पर झुकी हुई होती है। एक भुजा दूसरी भुजा से अपेक्षाकृत अधिक लंबी होती है, और इसका झुकाव मध्यम होता है, जबकि दूसरी भुजा थोड़ी छोटी होती है, और इसका झुकाव काफी खड़ा होता है। 

एकनत बलनः इस प्रकार के बलन में एक भुजा धरातल से समकोण बनाती है, और इसका ढाल लगभग ऊर्ध्वाधर होता है, जबकि दूसरी भुजा साधारण रूप से झुकी हुई होती है। 

समनत बलनः जब संपीड़न के कारण दोनों दिशाओं में समान दबाव पड़ता है, तो बलन की दोनों भुजाएं एक ही दिशा में झुक जाती हैं और एक दूसरे के सामानांतर हो जाती हैं, परंतु ये क्षैतिज नहीं होती। 

परिबलन या शयान बलनः जब क्षैतिज संचलन अत्यधिक तीव्र हो जाता है तो अत्यधिक संपीड़न के कारण इतना अधिक बलन हो जाता है कि बलन की दोनों भुजाएं परस्पर सामानांतर होती हुई क्षैतिज दिशा में हो जाती हैं। 

2.3  ग्रीवाखण्ड़ (Nappes)

ग्रीवाखण्ड़ परिबलन मोड़ में एक भुजा दूसरी भुजा पर क्षैतिज दिशा में पड़ी होती है। जब अंतर्जात बल अधिक सक्रिय हो जाता है तो संपीडन अधिक होने लगता है, और परिबलन की उलटी हुई भुजा बहुत अधिक मुड़ जाती है और बलन अपने कक्ष पर टूट जाता है और मोड़ का एक भाग खिसक कर दूसरे के ऊपर चढ़ जाता है। इस दशा में निचली परतें ऊपर आ जाती हैं और उनका क्रम उलट जाता है। यदि अब भी खिंचाव जारी रहा तो ऊपर वाली भुजा टूटने के बाद अपने स्थान से कई किलोमीटर दूर चली जाती है। टूट कर दूर होने वाली भुजा के नीचे अन्य प्रकार की शैलें होती हैं जिनका भुजा की शैलों से संबंध नहीं होता। इस प्रकार किसी परिबलन की टूटी हुई भुजा को ग्रीवाखण्ड़ कहते हैं। वर्तमान बलन पर्वतों में ग्रीवाखण्ड़ों के अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं। ग्रीवाखण्ड़ों के चार प्रमुख समूह हैं - हेल्वेटिक ग्रीवाखण्ड, पेन्नईने ग्रीवाखण्ड़, ऑस्ट्रिड़ ग्रीवाखण्ड़ और दिनारीड़ ग्रीवाखण्ड़।

2.4 दरार घाटी (Rift Valley)

दरार घाटी भ्रंशन गतिविधियों के कारण निर्मित एक प्रमुख उच्चावच विशेषता है। यह एक द्रोणिका, अवसाद या दो पटलीय भागों के बीच की घाटी का प्रतिनिधत्व करता है। दरार घाटियों की निर्मिति पटलीय भागों के विस्थापन और दो साधारण भ्रंशों के बीच के मध्य भाग की क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर हलचल के सगोत्रीय बलों के संचलन द्रारा होती है। दरार घाटियों को सामान्यतः ग्राबेन भी कहा जाता है, जो एक जर्मन शब्द है, जिसका अर्थ है एक द्रोणिका के आकार का अवसाद। एक दरार घाटी दो प्रकार से निर्मित हो सकती है;

  1. जब दो साधारण भ्रंशों के बीच का मध्य भाग नीचे की ओर छूटता है, जबकि छूटे हुए खंड़ के दोनों ओर के खंड़ स्थिर रहते हैं 
  2. जब दो साधारण भ्रंशों के बीच का मध्य भाग स्थिर रहता है, और मध्य स्थिति के दोनों ओर के खंड़ ऊपर की ओर उठते हैं। 

राइन दरार घाटी दरार घाटी का एक अच्छा उदाहरण है। यह एक ओर से वोसगेस और हार्ड्ट पर्वतों से घिरा हुआ है, जबकि दूसरी ओर से ब्लैक फॉरेस्ट और ओडेनवाल्ड़ पर्वतों से घिरा हुआ है। कुछ अन्य दरार घाटियां हैं जॉर्ड़न नदी घाटी, दक्षिणी कैलिफोर्निया की मृत्यु घाटी, और एशिया का मृत सागर। दरार घाटियां न केवल महाद्वीपीय पटलीय सतहों तक सीमित हैं, बल्कि वे समुद्र ताल पर भी पाई जाती हैं। सबसे गहरे ग्राबेन ‘‘सागरीय गहराईयों‘‘ और खाइयों के रूप में पाये जाते हैं।  

2.4.1 दरार घाटियों का उद्गम 

दरार घाटियों के उदगम की परिकल्पनाएं आमतौर पर दो श्रेणियों में वर्गीकृत हैं 

  1. तनावमूलक परिकल्पना - जो तनावमूलक बलों पर आधारित हैं 
  2. संपीड़न परिकल्पना - जो संपीड़न मूलक बलों पर आधारित हैं 

हालांकि इन दोनों परिकल्पनाओं की अनेक सीमायें हैं, और इस कारण ये दरार घाटियों के उदगम की अनेक जटिल समस्याओं का समाधान करने में असफल रही हैं। 

ई.सी. बुलार्ड़ की परिकल्पनाः ई.सी. बुल्लार्ड़ ने दरार घाटियों के उदगम की अपनी परिकल्पना गुरुत्वाकर्षण के एक सर्वेक्षण के दौरान स्वसिद्ध की थी। इस सिद्धांत के अनुसार जब भूमि के दोनों ओर से आने वाले संपीड़न बलों की क्रमबद्ध चरणों की श्रृंखला पूर्ण हो जाती है तब दरार घाटी की निर्मिति होती है। क्षैतिज संपीड़न बल भूमि के दोनों ओर आमने-सामने कार्यरत होते हैं। यह पार्श्विक संपीड़न इतना अधिक बढ़ जाता है, कि यह चट्टान के सामर्थ्य से अधिक हो जाता है और पटलीय चट्टान के एक स्थान पर एक दरार विकसित होती है। निरंतर संपीड़न बल के कारण यह दरार धीरे-धीरे बड़ी होती जाती है। दरार की निर्मिति के कारण, एक भाग दूसरे भाग के ऊपर हो जाता है, और इस भाग को क्षेप कहते हैं। दूसरी ओर, दूसरा भाग पहले भाग के सापेक्ष नीचे की ओर फेंका जाता है। इस प्रक्रिया को अवक्षेपण कहते हैं।  

अवक्षेपण स्थान पर विकसित हुई दरार बढे़ हुए संपीड़न के कारण विस्तारित हो जाती है और अंततः दरार घाटी बन जाती है।

2.5 बहिर्जात अथवा बाह्य बल(Exogenetic Forces)

बहिर्जात बल या प्रक्रियाएं जिन्हें अनाच्छादन प्रक्रियाएं या ‘‘विनाशकारी बल या प्रक्रियाएं‘‘ भी कहा जाता है, वायुमंड़ल से उठती हैं। ये प्रक्रियाएं निरंतर रूप से वच्चावचन विशेषताओं का विनाश करने में लगी रहती हैं, और ये बहिर्जात बलों द्वारा उनके अपक्षय, अपक्षरण, और निक्षेपण की गतिविधियों द्वारा निर्मित होती हैं। अनाच्छादन में अपक्षय और अपक्षरण दोनों शामिल होते हैं, जहां अपक्षय एक गतिहीन प्रक्रिया होने के कारण इसमें चट्टानों का विघटन और वियोजन शामिल होता है, जबकि अपक्षरण एक गतिशील प्रक्रिया है, जिसमें सामग्री का निवारण और विभिन्न गंतव्यों को उसके परिवहन, दोनों की प्रक्रिया शामिल है। 

2.5.1 अपक्षय (Weathering)

एक मूल चट्टान के अपक्षय का परिणाम उन मृदाओं की निर्मिति में होता है जो जीवमंड़ल में जैविक जीवों के जीवन के लिए बहुत ही आवश्यक हैं। अतः ये प्रक्रियाएं जैवमण्ड़ल की पारिस्थितिकी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। मूल रूप से अपक्षय तीन प्रकार का होता है। 

भौतिक या यांत्रिक अपक्षयः इसके कारण चट्टानों के टुकडे़ हो जाते हैं। पानी चट्टानों की इन दरारों में रिस जाता है। यदि तापमान गिर कर पर्याप्त रूप से कम हो जाता है, तो पानी जम जायेगा। जब पानी जमता है, तो यह विस्तारित होता है। तब बर्फ एक कील का कार्य करती है। यह धीरे-धीरे दरार को चौड़ा करती है, और चट्टान को विभाजित कर देती है। जब बर्फ पिघलती है, तो पानी चट्टान के छोटे-छोटे टुकडों को अपने साथ प्रवाहित करके ले जाने के माध्यम से अपक्षरण का कार्य करता है। 

यांत्रिक अपक्षय तब भी होता है जब चट्टान गर्म होती है, और फिर ठंड़ी होती है। तापमान में होने वाला यह परिवर्तन चट्टान का विस्तारण और संकुचन करता है। जब यह क्रिया बार-बार होती है, तो चट्टान कमजोर हो जाती है। समय के साथ उसके टुकडे़ हो जाते हैं। 

एक अन्य प्रकार का यांत्रिक अपक्षय तब होता है जब कठोर चट्टान के पास की मिटटी या अन्य पदार्थ पानी को अवशोषित करते हैं। पानी के साथ मिटटी फूलती है, जो आसपास की चट्टान को तोड़ देती है। 

चट्टानों के अपक्षय में लवण भी कार्य करते हैं। कभी-कभी खारा पानी चट्टान के छिद्रों और दरारों में प्रवेश कर जाता है। यदि खारा पानी वाष्पीकृत हो जाता है, तो पीछे लवण के माणभ रह जाते हैं। जैसे-जैसे ये माणभ बढ़ते हैं, तो ये चट्टान पर दबाव बढाते हैं, और धीरे-धीरे उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित कर देते हैं। 

पौधे और पशु यांत्रिक अपक्षय के प्रतिनिधि होते हैं। किसी वृक्ष के बीज दरायुक्त चट्टान की मिटटी में अंकुरित होते हैं। जैसे-जैसे उनकी जड़ें बढ़ती हैं, वे दरारों को चौड़ा करती जाती हैं, और अंततः चट्टान को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ देती हैं। समय के साथ वृक्ष बड़ी चट्टानों को भी तोड़ सकते हैं। यहां तक कि काई जैसे छोटे-छोटे पौधे भी बढ़ते हुए चट्टानों में दरारें बना देते हैं। 

भूमिगत सुरंगें बनाने वाले पशु जैसे छछूंदर और प्रेयरी कुत्ते भी चट्टानों और मृदा को तोड़ने का कार्य करते हैं। दूसरे पशु जमीन के ऊपर चट्टानों को खोदते हैं, जिसके कारण चट्टान धीरे-धीरे टूटती जाती है। 

रासायनिक अपक्षयः रासायनिक अपक्षय उन पदार्थों को परिवर्तित कर देता है जिनसे चट्टानें और मृदा बनी होती हैं। कभी-कभी हवा या मिटटी से कार्बन ड़ाइऑक्साइड पानी के साथ मिल जाती है। यह कार्बनिक अम्ल नामक एक कमज़ोर अम्ल का निर्माण करती है, जो चट्टान को गला सकता है। 

कार्बनिक अम्ल विशेष रूप से चूना पत्थर को गलाने में बहुत ही प्रभावी होता है। जब कार्बनिक अम्ल चूना पत्थर के माध्यम से जमीन के नीचे रिसता है तो यह विशाल दरारें बना सकता है, या गुफाओं के बडे़ संजाल को खोखला कर सकता है। अमेरिका के न्यू मेक्सिको राज्य के कार्ल्सबैड कैवर्न्स राष्ट्रीय उद्यान में 110 से अधिक चूना पत्थर की गुफाएं हैं। इनमें से सबसे बड़ी गुफा को बिग रूम कहा जाता है। 1,200 मीटर (4,000 फुट) लंबाई और 190 मीटर (625 फुट) चौड़ाई के साथ इसका आकार छह फुटबॉल मैदानों के बराबर है। कई बार रासायनिक अपक्षय चूना पत्थर के विशाल क्षेत्रों या पृथ्वी की सतह पर अन्य चट्टानों को गला देता है, जिससे एक परिदृश्य निर्मित होता है जिसे कार्स्ट कहते हैं। इन नाटकीय क्षेत्रों में सतही चट्टान बडे़-बडे़ छेदों, और गुफाओं से चिन्हित होती है। विश्व का एक सबसे दर्शनीय कार्स्ट है चीन में कुन्मिंग के निकट स्थित शिलिन, या पत्थर वन। इस परिदृश्य से चूना पत्थर सैकड़ों पतली, पैनी मीनारें उठती हुई दिखाई देती हैं। एक अन्य प्रकार का रासायनिक अपक्षय उन चट्टानों पर कार्यरत होता है जिनमें लोहे का अंश होता है। ये चट्टानें ऑक्सीकरण की प्रक्रिया के कारण ज़ंग खा जाती हैं। जैसे ही यह ज़ंग विस्तारित होती है, यह चट्टान को कमजोर बना देती है, और उसके टूटने में सहायता करती है। 

जैविक अपक्षयः जैविक अपक्षय वह प्रक्रिया है जिसमें पौधों, पशुओं और रोगाणुओं के माध्यम से चट्टानों का कमजोर होना और अंततः विखंडित होना शामिल है। बढ़ते हुए पौधों की जडें चट्टान पर दबाव या तनाव डाल सकती हैं। हालांकि यह प्रक्रिया भौतिक है, डाला गया दबाव एक जैविक प्रक्रिया के माध्यम से कार्य करता है (अर्थात, जड़ों के बढ़ने की प्रक्रिया)। जैविक प्रक्रियाएं रासायनिक अपक्षय भी निर्मित कर सकती हैं, उदाहरणार्थ, जहां पौधों की जडें या सूक्ष्म जीव जैविक अम्लों की निर्मिति करते हैं, जो खनिजों को गलाने का कार्य करते हैं। 

सूक्ष्म जैविक गतिविधि चट्टानों की रासायनिक रचना में परिवर्तन के माध्यम से चट्टान खनिजों को विखंडित करती है, और इसे अपक्षय के लिए अधिक ग्रहणक्षम बना देती है। सूक्ष्म जैविक गतिविधि का एक उदाहरण है शैवाक। शैवाक एक फफूंद और शैवाल है, जो एक सहजीवी संबंध में साथ-साथ रहते हैं। फफूंद ऐसे रसायनों का उत्सर्जन करती है जो चट्टानों के खनिजों का विखंडन कर देते हैं; चट्टान से इस प्रकार से उत्सर्जित खनिज शैवाक द्वारा उपभोग कर लिए जाते हैं। जैसे यह क्रिया जारी रहती है, चट्टान में छेद और अंतराल निर्मित होना शुरू हो जाते हैं, जो चट्टान को आगे के भौतिक और रासायनिक अपक्षय के लिए खोल देते हैं। 

मनुष्य और अपक्षयः अपक्षय एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, परंतु मानव गतिविधियाँ इसकी गति को बढ़ा सकती हैं। उदाहरणार्थ, कई प्रकार का वायु प्रदूषण अपक्षय की दर में वृद्धि कर देता है। कोयले, प्राकृतिक गैस और का जलना नाइट्रोजन ऑक्साइड़ और सल्फर डाइऑक्साइड जैसे रसायन वायुमंडल में उत्सर्जित करता है। जब ये रसायन सूर्य प्रकाश और नमी के संपर्क में आते हैं, तो वे अम्लों में परिवर्तित हो जाते हैं, और फिर वे अम्ल वर्षा के रूप में धरती पर गिरते हैं।

अम्ल वर्षा तेजी से चूना पत्थर, संगमरमर और अन्य प्रकार के पत्थरों का अपक्षय करती है। अम्ल वर्षा का प्रभाव कब्रों पर लगे पत्थरों पर देखा जा सकता है। इनपर खुदे हुए नाम और अन्य विवरण पढ़ना लगभग असंभव होता है। अम्ल वर्षा ने अनेक ऐतिहासिक इमारतों और स्मारकों को भारी क्षति पहुंचाई है। 71 मीटर (233 फुट) ऊंची चीन के माउंट एमेई की लेषण विशाल बुद्ध की मूर्ति विश्व की सबसे विशाल बुद्ध की मूर्ति है। इसे 1300 वर्ष पूर्व तराशा गया था, और अनेक सदियों तक यह बिना किसी नुकसान के थी, किंतु अम्ल वर्षा ने इसकी नाक को काला कर दिया है, और इसके कुछ बालों को टूटने और गिरने को मजबूर कर दिया है। अपक्षय का प्रकार, इसकी दर और अपक्षय का स्तर अनेक नियंत्रक कारकों पर निर्भर होता हैः किस प्रकार की अपक्षय प्रक्रिया होगी इसका निर्धारण जलवायु करती है, जो व्यापक रूप से उपलब्ध पानी की मात्रा और तापमान द्वारा निर्धारित होती है। उच्च तापमानों पर रासायनिक प्रतिक्रियाएं अधिक शीघ्र गति से होती हैं, जबकि पाला पच्चर ठंडी जलवायु में अधिक होता है। 

चट्टानों के प्रकार उस विशिष्ट पर्यावरण में होने वाली चट्टानों के अपक्षय की प्रक्रिया के प्रतिरोध को निर्धारित करते हैं। प्रत्येक चट्टान का प्रकार कुछ विशिष्ट खनिजों से बना होता है, जो क्रिस्टलीकरण, रासायनिक संबंध या जुड़ाव द्वारा एक दूसरे से जुडे़ होते हैं। जब प्लेट विवर्तनिकी के बल इन चट्टानों को उस पर्यावरण से हटाते हैं जिनमें उनका निर्माण हुआ है, और उन्हें वायुमंडल के सामने खुला कर देते हैं, तो उनका अपक्षय शुरू हो जाता है।  

चट्टान संरचनाः उच्च रूप से जुड़ी हुईं और भ्रंशित चट्टानें ऐसी अनेक सतहें प्रस्तुत करती हैं जो कमजोर होती हैं और जिनके निकट से अपक्षय प्रतिनिधि (जैसे पानी) चट्टानों के खंड में प्रविष्ट हो सकते हैं। 

स्थलाकृतिः ढ़ाल का कोण, उस दर को नियंत्रित करके जिससे पानी चट्टान के खंड़ से प्रवाहित होगा, अपक्षय प्रणाली की ऊर्जा का निर्धारण करता है। आमतौर पर उच्च या विवर्तनिकी की दृष्टि से सक्रिय क्षेत्र, जिनकी ढाल अधिक खड़ी होती है, उनकी अपक्षय की प्रणाली अधिक गतिमान होती है, जबकि सपाट संतालों की अपक्षय प्रणाली अपेक्षाकृत धीमी होती है। 

अपक्षरणः अपक्षरण की गतिकी और प्रभावोत्पादकता इस बात को निर्धारित करती है की किस गति से अपक्षय हुई सामग्री हटाई जाएगी, किस आवृत्ति से चट्टान अपक्षय के लिए निवावरण होगी, और क्या गहराई से अपक्षय हुई रूपरेखा संरक्षित होती हैं। 

समयः उस काल की अवधि, जब एक ही प्रकार का अपक्षय जलवायु परिवर्तन, पृथ्वी की हलचल और अन्य कारकों द्वारा हस्तक्षेप के बिना अविरल परिचालित होता रहा है उस हद और गहराई का निर्धारण करता है जिससे चट्टानों का अपक्षय हुआ है। 

2.5.2  अपक्षरण 

अपक्षरण उन प्रक्रियाओं का सामान्य नाम है जिनके माध्यम से चट्टानें टूटती है (उनका अपक्षय होता है) और वे प्रक्रियाएं जो टूटे हुए पदार्थों को अपने साथ प्रवाहित करके (परिवहन) ले जाती हैं। अपक्षरण की प्रक्रियाओं में बहता हुआ पानी या नदियां, भूजल, समुद्र की लहरें, हिमनद, परिहिमानी प्रक्रियाएं और हवाएं शामिल हैं। ये अपक्षरण प्रक्रियाएं चट्टानों का अपक्षरण करती हैं, अपक्षरित सामग्री का परिवहन करती हैं, और उन्हें उचित स्थानों पर जमा करती है, और इस प्रकार से विभिन्न प्रकार के अपक्षरित और संग्रहित भूखंडों की निर्मिति करती है, जो भिन्न-भिन्न परिमाणों की और भिन्न-भिन्न आकारों के होते हैं। 

अपक्षरण की भौतिक प्रक्रियाओं को अपघर्षण या यांत्रिक अपक्षरण कहते हैं यरासायनिक प्रक्रियाओं को संक्षारण या रासायनिक अपक्षरण कहते हैं। परंतु अपक्षरण के अधिकांश उदाहरणों में अपघर्षण और संक्षारण दोनों के कुछ भाग शामिल होते हैं। अपक्षरण के प्रतिनिधि गुरुत्वाकर्षण, बर्फ, पानी (सैलाबी अपक्षरण) और हवा (वातोढ़ अपक्षरण) हैं। कभी-कभी अपक्षरण अपक्षय को छोडकर केवल परिवहन भी होता है। अपक्षरण में वृहद क्षरण तब तक शामिल नहीं होता जब तक कि अपक्षरण की चर्चा विवर्तनीकी के संबंध में नहीं की जाती, जिस मामले में उत्खनन शायद अधिक बेहतर शब्द होगा।

2.6  भूआकृति विकास का डेविस सिद्धांत(Davisian Theory)

विलियम मॉरिस डेविस, जिन्हें आमतौर पर ‘‘आधुनिक भूगोल का जनक‘‘ कहा जाता है, ने भू-आकृति निर्मिति और अपक्षरण का एक सिद्धांत विकसित किया था, जिसे ‘‘भौगोलिक चक्र‘‘ कहा जाता है। आम भाषा में इस सिद्धांत को ‘‘अपक्षरण का चक्र‘‘ कहा जाता है, या अधिक उचित रूप से इसे ‘‘भू-आकृतिक चक्र‘‘ कहते हैं। इस सिद्धांत ने स्पष्ट किया कि भू-आकृतियां और पर्वत पहले निर्मित होते हैं, फिर परिपक्व होते हैं और फिर पुराने हो जाते हैं। 

उन्होंने स्पष्ट किया कि यह चक्र पर्वतों के ऊपर उठने से शुरू होता है। नदियां और जल धाराएं पर्वतों के बीच अंग्रेजी ‘‘वी‘‘ के आकार की घाटियां निर्मित करना शुरू करती हैं (इस चरण को ‘‘युवावस्था‘‘ कहा जाता है)। इस पहले चरण के दौरान उच्चावच सर्वाधिक खड़ी और सर्वाधिक अनियमित होते हैं। समय के साथ जल धाराएं अधिक चौड़ी घाटियां निर्मित करने में सक्षम हो जाती हैं (इसे ‘‘परिपक्वता‘‘ कहा जाता है) और इसके बाद ये भूल-भुलैया में परिवर्तित होना शुरू हो जाती हैं, और अपने पीछे नरमी से लुढ़कती पहाडियां छोड़ देती हैं (इसे ‘‘वृद्धावस्था‘‘ कहा जाता है)। अंत में केवल एक सपाट मैदान बचता है (‘‘मूल आधार‘‘)। इसे डेविस ने ‘‘पेनिप्लेन‘‘ (लगभग सपाट) कहा। अंत में, पुनः ‘‘पुनर्जीवन‘‘ होता है व चक्र चलने लगता है।

2.7  पेंक का सिद्धांत (Penck’s Theory)

वॉल्टर पेंक ने 1924 में भू-आकृतियों का अपना भौगोलिक चक्र सिद्धांत प्रस्तुत किया था। पेंक ने डेविस के चक्र की अवधारणा की आलोचना की और उसका विरोध किया। पेंक ने डेविस के इस कथन से असहमति प्रकट की कि किसी भी भू-आकृति का उत्थान त्वरित होता है व उसके बाद भूपर्पटी की स्थिरता का लंबा काल होता है। डेविस की अवधारणा के विपरीत पेंक ने अपना सिद्धांत इन वैकल्पिक मान्यताओं पर विकसित किया कि उत्थान इतने लंबे समय तक होते रहते हैं कि अपक्षरण की प्रक्रिया भी इनके साथ-साथ ही चलती रहती है। 

पेंक की अवधारणा की विशेषता यह है कि इसके अनुसार एक दिए गए क्षेत्र की भू-आकृति का विकास संबंधित क्षेत्र की विवर्तनिकी गतिविधि पर निर्भर होती है। डेविस के विचार के विरुद्ध वे इस तथ्य से आश्वस्त थे कि भू-आकृति का विकास उत्थान और निम्नीकरण की दर और दोनों के पारस्परिक संबंधों की प्रावस्था का प्रतिफल होता है।

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