यूपीएससी तैयारी - अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं - व्याख्यान - 11

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भारत के व्यापार संबंध

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1.0 प्रस्तावना

राष्ट्रों के बीच दो प्रकार के व्यापार होते हैं- द्विपक्षीय व्यापार और बहुपक्षीय व्यापार। द्विपक्षीय व्यापार दो देशों के बीच होता है और बहुपक्षीय व्यापार दो से अधिक देशों के बीच मौजूद होता है। हाल के समय में, दो देशों के बीच मौजूद विदेशी प्रत्यक्ष निवेश संबंध, दो राष्ट्रों के बीच व्यापारिक संबंधों को परिभाषित करने में भी महत्वपूर्ण माना गया है।

अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में किसी देश से अन्य देश में धन के अंतर्प्रवाह को उन दोनों देशों के बीच संबंध स्थापित करने में लंबा समय लगता है। आज, वैश्वीकरण ने दो या अधिक देशों के बीच अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंध स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस घटना के पूर्व ऐसे अनेक देश थे जिन्होंने कठोर विदेशी व्यापारिक नियमों और कर नीतियों के रूप में व्यापारिक अवरोध खड़े किए थे जो वास्तव में अन्य देशों से विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को आकर्षित करने के पक्ष में नहीं थे। वैश्वीकरण और डब्ल्यूटीओ के युग में, विभिन्न देशों के बीच आर्थिक संबंधों में बड़े परिवर्तन घटित हुए हैं। व्यापारिक अवरोधों को हटाने और एक बेहतर आर्थिक पर्यावरण का निर्माण करने के लिए डब्ल्यूटीओ ने कई देशों की सरकारों के साथ मिलकर कार्य किया है। इसने संपूर्ण विश्व में अनेक मुक्त व्यापारिक क्षेत्रों का निर्माण किया है। मुक्त व्यापारिक क्षेत्रों के निर्माण के परिणामस्वरूप मुक्त व्यापार को बढ़ावा देना संभव हुआ है।

विभिन्न सुधार मापदंडों के क्रियान्वयन ने विश्व के अनेक देशों को अवरोधों के बिना एक-दूसरे के साथ व्यापार करने के अनेक अवसर प्रदान किए हैं। हलांकि, अब हम नए क्षेत्रीय गुटों जैसे टीपीपी एवं टीटीआईपी का उदय देख रहे हैं जो भारत के विकास को प्रभावित कर सकता है। 

2.0 भारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक संबंध

भारत के विश्व में अनेक देशों के साथ महत्वपूर्ण और सुदृढ़ आर्थिक संबंध हैं। व्यापारिक रूप से भारत ने कई देशों के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित किए हैं। नब्बे के दशक के प्रारंभ में आर्थिक सुधारों के बाद, भारतीय अर्थव्यवस्था को विभिन्न देशों के साथ आगे द्विपक्षीय व्यापारिक संबंधों और विदेश प्रत्यक्ष निवेश (एफ.डी.आई.) के लिए खोला गया। कई वस्तुओं पर आयात प्रतिबंधों को उठा दिया गया जिससे अन्य राष्ट्रों के साथ भारत के आर्थिक संबंधों का विस्तार हुआ।

2.1 भारत-अमेरिकी व्यापारिक संबंध

भारतीय अर्थव्यवस्था के आकार और सुदृढ़ता के कारण भारत के साथ व्यापार संयुक्त राज्य के लिए एक बड़ा उपहार है।

पिछले दशक में, भारत में अमेरिकी वस्तुओं के निर्यात में लगभग 700 प्रतिशत की वृद्धि हुई। सेवाओं का निर्यात पिछले चार वर्षों में दोगुना हो गया है। अमेरिकी एफ.डी.आई. में 200 मिलियन अमेरिकी डॉलर से 6 बिलियन अमेरिकी डॉलर की वृद्धि हुई है और अमेरिकी-भारत व्यापार अब एक संतुलित व्यापार है। यह सूक्ष्म अर्थव्यवस्था और मुद्रा-संबंधित उन तनावों के क्षेत्र को कम करता है जिन्हें संयुक्त राज्य ने अन्य देशों के साथ अनुभव किया है, विशेष रूप से 1970 और ’80 में जापान, और बाद में चीन के साथ।

भारत में एफ.डी.आई. आश्चर्यजनक रूप से उदार हो गया है और अब विदेशी वित्तीय निवेशकों की भारतीय इक्विटी, कॉर्पारेट और सरकारी बॉण्ड्स और ऋणपत्र एवं विदेशी विनिमय पर पहुँच है। ये परिवर्तन द्विपक्षीय घरेलू सर्वसम्मति का परिणाम है कि खुलेपन और वैश्वीकरण के लिए कोई विकल्प नहीं है।

किंतु भारत-अमेरिका व्यापार तीन चुनौतियों का सामना करता है।

प्रथम, दोनों देशों में क्षेत्रीय रक्षात्मकता ने स्थानीयकरण को पुनः आधार प्रदान किया है। यह रक्षात्मकता विदेशी प्रदाताओं के सापेक्ष इनपुट्स और उपकरण के घरेलू प्रदाताओं का समर्थन करता है। यह सुदृढ़ नियोजन के लिए एक निर्माण आधार बनाने हेतु भारत की इच्छा का परिणाम है। रक्षात्मकता इस लक्ष्य को पाने के लिए न केवल सर्वश्रेष्ठ नीति है बल्कि इस क्षेत्र में बेहतर नीतियों को लागू करने के लिए राजनीतिक रूप से कठिन है। इसके अतिरिक्त, भारत ने चीन की चाशनी को पसंद कर लिया है-यह विदेशी निवेशकों को स्वदेशी बनाने और स्थानीयकृत करने के लिए प्रभावित कर रहा है।

दूसरा, भारत में एक कमजोर और अनिश्चित नियामक एवं कर वातावरण है जो सिविल न्यूक्लियर उद्योग (नागरिक परमाणु उद्योग), इंफ्रास्ट्रक्चर, फार्मास्युटिकल और, व्यापक रूप से, विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियो को प्रभावित करता है।

तीसरा, भारत में निवेश की इच्छा रखने वाली अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों एक अस्पष्ट किंतु वास्तविक हानि का सामना करती हैं। भारत ने व्यापार करने वाले अपने उन सबसे बड़े साझेदारों के साथ मुक्त व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं (या करने वाले हैं) जो संयुक्त राज्य के लिए सभी प्रमुख प्रतिस्पर्धी हैंः यूरोप, जापान, सिंगापुर, एशियान और संभवतः एशियान $6 और कनाड़ा। शीघ्र ही, यदि पहले नहीं, तो यह विविधता अमेरिकी व्यापार के लिए सबसे बड़ी चुनौती हो सकती है। चूँकि, भारत के अवरोध हैं और बाजार बड़ा एवं उभरता हुआ है, इसलिए अमेरिकी कंपनियों के लिए यह हानि गंभीर हो सकती है।

राष्ट्रपति ट्रंप की सोच रही है कि भारत द्वारा वस्तु व्यापार एवं सेवा व्यापार दोनों में ही कमाये जा रहे अधिशेषों को घटाया जाये। पुनः भारत के विरूद्ध एवं लघु व्यापार युद्ध छेड़ दिया, और सन 2019 में भारत को मिलने वाले जीएसपी लाभ भी हटा दिये।

2.2 भारत-यूरोपीय संघ व्यापारिक संबंध

2003-2011 के दौरान, यूरोपीय संघ (ईयू) और भारत के बीच व्यापार का मूल्य, ईयू को भारत के अग्रणी व्यापारिक साझेदार के रूप में आगे खड़े करते हुए, लगभग 38.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर से 105.9 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक तीन गुना हो गया। वास्तव में, ईयू-भारत व्यापार, ईयू को भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार के रूप में सुदृढ़ करते हुए, भारत के कुल द्विपक्षीय व्यापार का 9.9 प्रतिशत तक बढ़ गया। दूसरी ओर, भारत ईयू का नवां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। चल रही बातचीत के मद्देनज़र, देशों के बीच मुक्त व्यापारिक समझौते (एफटीए) पर त्वरित निष्कर्ष खोजते हुए, भारत-ईयू व्यापार अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक परिदृश्य की निर्धारण करने वाली सुविधा बनने की ओर अग्रसर है।

जारी एफटीए बातचीतः भारत-ईयू द्विपक्षीय व्यापार और निवेश समझौते (बीटीआईए) पर वार्ता-जो 90 प्रतिशत व्यापार योग्य वस्तुओं पर कर हटाने की योजना बना रही है - सबसे पहले 2007 में प्रारंभ हुई। हालाँकि, दुर्भाग्यवश वार्ता अधिक समस्याओं के कारण अनिश्चित रूप से समाप्त हो गई है और समझौते की समाप्ति के लिए कोई अनुमानित समय सीमा नहीं है।

प्रगति धीमा कर देने वाली समस्याओं में भारत के लिए अपनी एफडीआई पूँजी बीमा क्षेत्र में 26 प्रतिशत से 49 प्रतिशत बढ़ाने के लिए ईयू की माँगें और भारत में दवा निर्माण उद्योग में ‘‘डेटा विशिष्टता‘‘ के लिए ईयू की माँगें सम्मिलित हैं।

भारत में ईयू निर्यातः सन् 2018-2019 में भारत को हुये यूरोपीय संघ के निर्यात अमेरिकी डॉलर 58,425 बिलियन के थे - जो भारत के कुल आयात का 11.36 प्रतिशत था। यह वर्ष 2017-18 पर 22 प्रतिशत की बढ़त थी।

कुछ ईयू सदस्य राज्यों ने भारत में निर्यात वस्तुओं में वृद्धि करने का प्रबंध किया है, जिनमें पोलैंड, पुर्तगाल और आयरलैंड सभी ने वर्ष-दर-वर्ष अपनी निर्यात वस्तुओं में क्रमशः 36 प्रतिशत, 22.5 प्रतिशत और 12 प्रतिशत वृद्धि की है। विशेष रूप से, भारत में बेल्जियम के उच्च-स्तरीय निर्यात की व्याख्या भारत में रत्नों और आभूषणों की वृहद माँग से की जा सकती है जो दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार का 70 प्रतिशत है।

2.3 भारत-चीन व्यापार संबंध

भारत-चीन व्यापारिक संबंध जटिल हैं किंतु दोनों राष्ट्र एक-दूसरे के महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार हैं। यह भारत के आर्थिक और व्यावसायिक नियोजन के लिए चीन के साथ कई संस्थागत प्रक्रियाओं द्वारा सिद्ध होता है। आर्थिक संबंधों और व्यापार, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर भारत-चीन संयुक्त आर्थिक समूह (जेईजी) भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की चीन यात्रा के दौरान 1988 में स्थापित एक मंत्रालय स्तरीय वार्ता है। एक संयुक्त अध्ययन समूह (जेएसजी) को विस्तृत व्यापार और आर्थिक सहयोग में दोनों देशों के बीच संभावित पूरकों का निरीक्षण करने के लिए जून 2003 में भूतपूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी की यात्रा के बाद स्थापित किया गया। इसकी अनुशंसाओं के अनुसार, एक संयुक्त कार्य बल (जेटीएफ) को भारत-चीन क्षेत्रीय व्यापार व्यवस्था के औचित्य का अध्ययन करने के लिए स्थापित किया गया। जेटीएफ रिपोर्ट अक्टूबर 2007 में पूर्ण हुई। व्यापार, कृषि और ऊर्जा पर संयुक्त कार्यकारी समूह भी हैं। दिसंबर 2010 में, दोनों देश भारत-चीन रणनीति और आर्थिक संवाद (एसईडी) को स्थापित करने के लिए सहमत हुए। पहला एसईडी 26 सितंबर, 2011 को बीजिंग में हुआ।

भारत-चीन रणनीतिक और आर्थिक संवाद (एसईडी): चीनी प्रधानमंत्री वेन च्यापो की दिसंबर 2010 में भारत यात्रा के दौरान, भारत और चीन रणनीतिक और आर्थिक संवाद पद्धति स्थापित करने के लिए सहमत हुए। एसईडी बदलते अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक और वित्तीय परिदृश्य के परिणामस्वरूप दोनों राष्ट्रों को प्रभावित करने वाली रणनीतिक सूक्ष्म-आर्थिक समस्याओं पर चर्चा करने के लिए, चुनौतीपूर्ण घरेलू आर्थिक समस्याओं को संभालने में उनके व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ अभ्यासों को साझा करने के लिए और सहयोग को बढ़ावा देने, सीखने और अनुभव साझाकरण के लिए विशिष्ट क्षेत्रों को पहचानने हेतु दोनों पक्षों के लिए एक मंच है। एसईडी में भारतीय पक्ष का प्रतिनिधित्व श्री मोंटेक सिंह अहलूवालिया, उपाध्यक्ष, योजना आयोग द्वारा किया गया जबकि चीनी पक्ष का प्रतिनिधित्व श्री झैंग पिंग, अध्यक्ष, राष्ट्रीय विकास और सुधार आयोग (एनडीआरसी) द्वारा किया गया।

प्रथम एसईडी सभाः प्रथम भारत-चीन एसईडी सभा बीजिंग में सितंबर 26-27, 2011 को हुई। वे समस्याएँ जिन पर प्रथम एसईडी के दौरान चर्चा हुई उनमें सम्मिलित थींः दोनों देशों की 12वीं योजना प्राथमिकताओं का परिचय, प्रत्येक देश की मौद्रिक और वित्तीय नीतियों पर चर्चा, दोनों देशों की निवेश नीतियाँ, ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा पर नीतियाँ इत्यादि। दोनों पक्षों ने नीति समन्वयन, इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा, पर्यावरण सुरक्षा और उच्च-प्रौद्योगिकी पर पाँच कार्यकारी समूहों का निर्माण करने का निर्णय किया।

आधिकारिक सभाओं के अलावा, एसईडी ने तियांजिन की स्थल यात्रा को भी सम्मिलित किया, जहाँ भारतीय दल का परिचय जल से लवणता हटाने की सुविधा से कराया गया। आधिकारिक सभाओं के अंत में दोनों पक्षों ने प्रथम एसईडी के सहमत कार्यवृत्त पर हस्ताक्षर किए. भारतीय दल ने भी चीनी प्रधानमंत्री वेब जियाबाओ को आमंत्रित किया।

द्वितीय एसईडी सभाः दूसरी एसईडी सभा 26 नवंबर, 2012 को नई दिल्ली, भारत में हुई। दूसरी सभा के दौरान, दोनों पक्षों ने वैश्विक स्तर पर अधिक सहयोग, दीर्घ आर्थिक नीतियों पर संचार को सुदृढ़ करने, फैलने वाले व्यापार और निवेश को गहरा करने और वित्तीय एवं इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देने को सम्मिलित करते हुए विषयों की व्यापक श्रृंखला पर चर्चा की। पाँच कार्यकारी समूहों द्वारा दिए गए प्रस्तावों और अनुशंसाओं पर दूसरी वार्ता के दौरान विचार किया गया एवं उनकी भावी गतिविधियों के लिए दिशानिर्देश दिए गए। दोनों पक्ष सहमत हुए कि वर्तमान वैश्विक आर्थिक परिस्थिति में भारत और चीन के बीच आर्थिक नियोजन स्तर को बढ़ाना महत्वपूर्ण था।

दोनों पक्षों ने कुल 4 शासन-शासन और 7 व्यावसायिक एमओयू पर भी भारत में दूसरी एसईडी के दौरान हस्ताक्षर किए। जी-2-जी एमओयू का विवरण निम्नप्रकार हैः

  1. भारतीय गणराज्य शासन के योजना आयोग और चीनी गणराज्य शासन के राष्ट्रीय विकास और सुधार आयोग के बीच उपक्रम संयुक्त अध्ययन पर सहमति ज्ञापन।
  2. ऊर्जा दक्षता के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर ऊर्जा दक्षता ब्यूरो, ऊर्जा मंत्रालय, भारत गणराज्य शासन और चीनी गणराज्य शासन के राष्ट्रीय विकास और सुधार आयोग के बीच सहमति ज्ञापन।
  3. रेलवे क्षेत्र में तकनीकी सहयोग बढ़ाने पर भारत गणराज्य शासन के रेलवे मंत्रालय और चीनी गणराज्य शासन के रेलवे मंत्रालय के बीच सहमति ज्ञापन।
  4. आईटी/आईटीईएस क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर राष्ट्रीय सॉटवेयर और सेवा कंपनी संगठन (नासकॉम), भारत और चीनी सॉटवेयर उद्योग संगठन (सीएसआईए) के बीच सहमति ज्ञापन।

पांचवीं एसईडी सभा : यह श्रृंखला जारी रही, और पांचवा भारत-चीन सामरिक आर्थिक डॉयलाग चीन की राजधानी बीजिंग में 14 अप्रैल 2018 को हुआ। भारत की तरफ से नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. राजीव कुमार थे और चीनी पक्ष का नेतृत्व किया श्री हे लिपेंग ने। चीन में भारत के राजदूत श्री गौतम बंबावाले भी मौजूद थे। 5 कार्यसमूहों ने - अधोसंरचना, उच्चप्रौद्योगिकी, ऊर्जा, संसाधन संरक्षण और नीति समनवय में - 13 अप्रैल 2018 को अब तक के कार्यो की समीक्षा की। 

  1. नीति समनवय कार्य समूह ने विस्तार में आपसी निवेश व सहयोग की समीक्षा की। चीन के कुछ प्रांतों के साथ आर्थिक क्षेत्र में सहयोग पर वार्ता हुई। दोनों देश एक-दूसरे को वे क्षेत्र बतायेगें जहां उनके उद्योगों को अपना व्यापार बढ़ाने में दिक्कतें आ रही हैं। सहयोगी से अपेक्षा रहेगी की वह त्वरित रूप से समस्यायें सुलझा दें।
  2. अधोसंरचना कार्य समूह ने चीनी कंपनियों द्वारा भारत में केवल सामान बेचने से आगे बढ़कर विनिर्माण ईकाइयां लगाने पर चर्चा की। भारत में बढ़ी मांग के चलते यह व्यवहार्य होगा और भारत में बने रेल्वे उत्पादों का निर्यात भी हो सकेगा। 
  3. सूचना प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रानिक विनिर्माण में, भारत और चीन के अलग-अलग प्रतिस्पर्धात्मक लाभ हैं, जिससे सहयोग के अवसर बनते हैं। भारत की ओर से नैस्काँम ने उच्च प्रौद्योगिकी क्षेत्रों जैसे कि स्मार्ट शहर, डिजिटल भुगतान, स्मार्ट विनिर्माण ने भारत-चीन सहयोग पर चर्चा की। दोनां पक्षों ने विचारो का आदान-प्रदान किया। 

2.4 भारत-जापान व्यापार संबंध

भारत और जापान के बीच अब तक प्रमुख विरोधी हित के बिना, सौहार्दपूर्ण संबंध रहा है। इस सौहार्दपूर्ण संबंध का आधार है व्यापार, अर्थव्यवस्था और तकनीकी सहयोग। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, भारत के साथ जापान के आर्थिक संबंधों का केंद्र युद्ध के पूर्व कपास के आयात से हटकर लौह अयस्कों का आयात हो गया। संबंधों में लगातार विकास हुआ क्योंकि जापान के अयस्कों के आयात और निर्यात उत्पादों के निर्यात में वृद्धि हुई। वास्तव में जापान द्वारा पहला येन ऋण 1958 में भारत को दिया गया था।

पारंपरिक रूप से, जापान भारतीय निर्यातों का दूसरा सबसे बड़ा गंतव्य स्थल रहा है (प्रमुख निर्यात वस्तुओं में रत्न, समुद्री उत्पाद, लौह अयस्क और सूती कपास सम्मिलित हैं)। भारत भी जापान से वस्तुओं का प्रमुख आयात करने वाला है, और हाल के वर्षों में इसका महत्व बढ़़ रहा है (प्रमुख आयात वस्तुओं में मशीनरी, प्लांट संबंधित उत्पाद, यातायात उपकरण, और इलेक्ट्रॉनिक मशीनरी सम्मिलित होते हैं)।

जापान और भारत के बीच वाणिज्य पर समझौता (1958) दोनों राष्ट्रों के बीच व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने के लिए उनके द्वारा हस्ताक्षर किए गए अद्वितीय अनुबंधों में से एक था। समग्र द्विपक्षीय व्यापार और निवेश पर जापान-भारत व्यापार वार्ता 1978 में प्रारंभ हुई. तब से ऐसी कई वार्ताएँ हो चुकी हैं। इसके अतिरिक्त, निजी क्षेत्र मंच जैसे ‘‘जापान-भारत व्यावसायिक सहयोग समिति की संयुक्त सभा‘‘, जो वार्षिक संयुक्त सभाएँ करता है, विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों में निजी-क्षेत्र द्विपक्षीय सहयोग के साथ-साथ पारस्परिक समझ को भी बढ़ावा देता है। 

भारत ऐसा पहला देश है जिस तक जापान ने पहले येन ऋण का विस्तार किया है और भारत जापान के ओडीए के सबसे बड़े प्राप्तकर्ताओं में से एक रहा है. जापान लंबे समय से भारत को सक्रिय रूप से सहायता दे रहा है, प्राथमिक रूप से अर्थव्यवस्था संरचना का अपग्रेड करने के लिए आधिकारिक विकास सहायता ऋणों के रूप में, लोक स्वास्थ्य और चिकित्सा सुरक्षा के माध्यम से गरीबी में कमी, कृषि और ग्रामीण विकास एवं जनसंख्या तथा एड्स प्रतिरोधी उपाय, छोटे व्यवसाय और पर्यावरण संरक्षण के लिए सहायता।

जापानी कंपनियों की रुचि 1991 से भारत में बढ़ी जब भारत ने आर्थिक उदारीकरण करना प्रारंभ किया। अधोसंरचना क्षेत्र में भी जापान 1958 से अपने आधिकारिक विकास सहायता (ओडीए) कार्यक्रम के माध्यम से भारत की सहायता कर रहा है। ओडीए को संरचनात्मक क्षेत्रों जैसे दूरसंचार, ऊर्जा और यातायात को प्रदान किया जाता है।

अधिकांश जापानी कंपनियों, जिन्होंने सर्वेक्षण किया, कहा कि वे लाभ कमा रहीं हैं और ‘‘सकारात्मक रूप से अपने कार्यों के आगे विस्तार पर विचार कर रहीं हैं‘‘। हालाँकि, उनमें से कई के लिए, निषेधात्मक घटक व्यावसायिक गतिविधियों, वातावरण और संस्कृति इत्यादि में अंतर है किंतु उसी समय वे भारत के विशाल बाजार की संभावना के बारे में भी जागरुक हैं, विशेष रूप से सूचना प्रौद्योगिकी और सूचना-प्रौद्योगिकी संबंधित बाजार में. जापानी निवेशक अनुभव करते हैं कि कुशल मानवश्रम की उपलब्धता भारत में विदेशी निवेश को आकर्षित करने में भारत द्वारा उठाया गया प्रमुख लाभ है किंतु उसी समय एक स्वस्थ्यवर्धक बाजार वृद्धि भी समान रूप से महत्वपूर्ण है।

यद्यपि सूचना प्रौद्योगिकी और ऑटोमोबाइल उद्योगों में निवेश बढ़ रहा है, अनियामन को धन्यवाद, आगे विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए आर्थिक सुधारों और अनियामन की आवश्यकता होती है। विशेष रूप से, खुदरा और रीयल इस्टेट उद्योग अभी भी विदेशी निवेशकों के निकट हैं, और संबंधित अनियामन मापदंडों की आवश्यक रूप से आवश्यकता है। श्रम अधिनियम के संशोधन, इंफ्रास्ट्रक्चर और व्यक्तिगत निजी कंपनियों का सुधार और स्वसहायता सुधार के द्वारा भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता को सुदृढ़ करने और बोधगम्य उत्पादकता को सुधारने के लिए भारत को कार्यवाही करने की निश्चित रूप से आवश्यकता है।

भारतीय निवेशकों के लिए, जापान में निवेश करना आकर्षक रहा है। जापान, जो एशिया की उभरती हुई अर्थव्यवस्था का व्यापारिक केंद्र है, को विश्व के दूसरे सबसे बड़े बाजार का दर्ज़ा दिया जाता है। उच्च कुशल मानव संसाधन के अतिरिक्त, जापान नवीनतम तकनीकियाँ प्रदान करता है, जहाँ इंफ्रस्ट्रक्चर बैक-अप का संबंध है, परिवहन नेटवर्क को विश्व के सर्वश्रेष्ठ नेटवर्कों में से एक का दर्जा दिया जाता है। जापान के साथ कार्य करने के अन्य लाभों में विश्वस्तरीय सूचना और संचार तकनीक (आईसीटी) सुविधा, उच्च रूप से विश्वसनीय संभार तंत्र संरचना और अन्य निवेशकों के अनुकूल सुविधाएँ सम्मिलित हैं। आर्थिक वैश्वीकरण का प्रतिसाद देते हुए, वाणिज्यिक कानून और देश की आर्थिक विधि संरचना के प्रमुख तत्वों को जापानी सरकार द्वारा सुधारा गया है।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि जापान में व्यवसाय करने वाली कई विदेशी कंपनियों ने जापानी कंपनियों के मुकाबले उच्च लाभ कमाया है। जापान ने चार प्रमुख विदेशी निवेश को पहचाना है जिनके नाम हैं, आईसीटी, जैवप्रौद्योगिकी, चिकित्सा सुरक्षा और वातावरण।

जापान प्राकृतिक गैस के अपने स्रोतों में परिवर्तन करना चाहता है क्योंकि यह वर्तमान में इंडोनेशिया, मलेशिया और ऑस्ट्रेलिया, जो प्रमुख आपूर्तिकर्ता हैं, के साथ अपनी 97 प्रतिशत आवश्यकताओं के लिए निर्यातों पर निर्भर है। प्राकृतिक गैस समझौते का लक्ष्य द्विपक्षीय गठबंधनों को मजबूत करना है क्योंकि जापान का सत्ता दल पश्चिमी एशिया में चीन की बढ़ती हुई उपस्थिति को रोकने के लिए भारत के साथ अपनी मजबूत साझेदारी का उपयोग करने की आशा करता है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने के लिए भी जापान और भारत के बीच समझौता उनकी बोलियों (दावों) में गठबंधन को प्रकट करता है।

2.4.1 भारत-जापान व्यापार का भविष्य

भारत और जापान अनिवार्य रूप से एक ‘‘खुले और भेदभाव-रहित, नियम आधारित बहुपक्षीय व्यापारिक प्रणाली‘‘ के प्रति प्रतिबद्ध हैं। भारत-जापान व्यापारिक संबंध और आर्थिक सहयोग समय के साथ मजबूत होता जा रहा है, यद्यपि, यदि पड़ोसी चीन के व्यापार की जापान के साथ तुलना की जाए, तो जापान के कुल व्यापार में भारत का हिस्सा कोई प्रभावी रूप नहीं दिखाता है। ऐसा ही विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के क्षेत्र में भी है। जापान, जो स्वयं भारत में चौथा सबसे बड़ा निवेशक है, इस दर्जे के साथ खुश नहीं है। भारत को द्रुत गति वाले आर्थिक सुधारों के माध्यम से और यथाशीघ्र देश को अनियामनों की बाधाओं से मुक्त करके निवेशकों के अनुकूल वातावरण बनाने के लिए बहुत कार्य करना है। 2018 में, भारत व जापान ने डॉलर 75 बिलियन का मुद्रास्वेप समझौता किया।




3.0 व्यापार अनुबंध 

विभिन्न क्षेत्रीय व्यापार अनुबंधों (आरटीए) में भारत की वर्तमान संलग्नता इस प्रकार है -

1.    आसियान की समीक्षा - माल अनुबंध में भारत का व्यापार 

समीक्षा का विस्तार/व्यापकता विचारणीय हैं और 11 जुलाई 2015 को कुआलालमपुर में संपन्न हुई। एसईओएम में चर्चा भी हुई।

2.     भारत-श्रीलंका व्यापक आर्थिक साझेदारी अनुबंध (सीईपीए) वार्ता में भारत

श्रीलंका मुक्त व्यापार अनुबंध (आयएसएलएफटीए), जो 1998 में तय हुआ था, सन् 2000 में क्रियान्वित हुआ। सार्क (एसएएआरसी) क्षेत्र में श्रीलंका भारत का सबसे बड़ा व्यापार साझेदार व्यापार 4 गुना बढ़कर, सन् 2000 में 658 मिलीयन यू.एस. डॉलर तक पहुँचा। श्रीलंका को भारत मुख्य रूप से पेट्रोलियम (क्रूड और उत्पाद), यातायात के साधन, कपास, सूती कपड़े, शक्कर (चीनी), औषधि और सूक्ष्म रसायनों का निर्यात करता हैं। श्रीलंका मुख्य रूप से भारत को मसाले, विद्युत उपकरण (इलेक्ट्रानिक को छोड़कर), यातायात के साधन, एवं मज्जा एवं कबाड़ा, नैसर्गिक रबर और पेपर बोर्ड का निर्यात करता हैं।

3.    भारत-थाईलैंड व्यापक आर्थिक सहयोग अनुबंध (सीईसीए) वार्ता 

अस्वीकृति के 29 बार के बाद भारत-थाईलैंड सीईसीए 15-17 जून 2015 को बैंकॉक, थाईलैंड में आयोजित हुई।

4.    बंगाल की खाड़ी में बहुआयामी तकनीकी और आर्थिक सहयोग (बीआयएमएसटीईसी) मुक्त व्यापार अनुबंध (एफटीए) का सूत्रपात हुआ 

बंगलादेश-भारत-श्रीलंका-थाईलैंड आर्थिक सहयोग (बीआईएसटी-ईसी) को स्थापित करने का श्रीगणेश 1994 में थाईलैंड द्वारा हुआ, ताकि उपक्षेत्रीय आधार पर आर्थिक सहयोग का दोहन हो, जिसमें दक्षिण पूर्व और दक्षिण एशिया के पड़ौसी देश, बंगाल की खाड़ी के आसपास एक समूह हो। दिसंबर, 1997 में म्यांमार शामिल हुआ और मुहिम का नाम बदलकर बीआईएमएसटी-ईसी हो गया। शुरूआत में सार्क के 5 सदस्य (भारत, बंगलादेश, भूटान, नेपाल और श्रीलंका) और एएसईएएन के 2 सदस्य (थाईलैंड, म्यामार) शामिल हुए। बीआईएमएसटी-ईसी को दो मुख्य क्षेत्रीय ’सेतु’ के तौर पर देखा गया। भारत की ’पूर्व की ओर देखो’ नीति में बीआईएमएसटी-ईसी एक महत्वपूर्ण भाग हैं और भारत के दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के साथ आर्थिक सहयोग को एक नया आयाम देते हैं। बीआईएमएसटी-ईसी के सदस्य देशों के बीच मुक्त व्यापार अनुबंध फल-फूल रहा हैं।

5.    भारत-खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) मुक्त व्यापार अनुबंध (एफटीए) पत्र 

भारतीय गणराज्य और खाड़ी सहयोग परिषद के बीच आर्थिक सहयोग हेतु एक अनुबंध पत्र पर 25 अगस्त 2004 को हस्ताक्षर हुए। अनुबंध पत्र के अनुसार दोनों देश व्यापार संबंधों को विस्तार देने और उदार बनाने के लिये उपायों और तरीकों को अपनायेगें और साथ ही उनके बीच हुए मुक्त व्यापार अनुबंध हेतु हरसंभव चर्चा करेगे। इस प्रकार, जीसीसी के साथ वार्ता प्रारंभ हुई। सन् 2006 और 2008 में वार्ताओं के दो दौर संपन्न हो चुके। तीसरा दौर नहीं हुआ क्योंकि जीसीसी सभी देशों और आर्थिक समूहों के साथ अपनी वार्ताएँ टाल चुका हैं और वर्तमान में सभी देशों और आर्थिक समूहों के साथ अपनी वार्ताओं का पुनरावलोकन कर रहा हैं। विभिन्न द्विपक्षीय/बहुपक्षीय सभाअें में वार्ताओं के शीघ्र पुनग्रहण हेतु प्रयास किये जा रहे हैं। 


6.    भारत-साकु महत्वपूर्ण व्यापार अनुबंध (पीटीए) वार्ताए

दक्षिण अफ्रीकन रीतिसंघ (एसएसीयू) में दक्षिण अफ्रीका, लेसोथो, स्वाझीलैंड, बोस्टवाना और नामीबिया शामिल हैं। अब तक, भारत-साकु पीटीए में वार्ताओं के 5 दौर संपन्न हो चुकें। भारत-साकु पीटीए की तकनीकी वार्ता का प्रथम दौर 5-6 अक्टूबर, 2007 को प्रिटोरिया में सपन्न हुआ। वार्ताओं का पंचम दौर 7-8 अक्टूबर, 2010 के दौरान संपन्न हुआ। वार्ताओं के इस दौर के दौरान, साकु ने पीटीए के परिवर्तित मूल विषय को एक कार्यशील दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत किया। आगे से, दोनों पक्ष निम्नलिखित बातों पर सहमत हुएः ;पद्ध ’मतभेद सुलझाने की नीति’ का मसौदा, ;पपद्ध भारत द्वारा प्रस्तावित ’रीति सहयोग और व्यापार सरलीकरण’ मसौदे का प्रयोग और टीबीटी की कार्यशील मसौदे के रूप में मान्यता, ;पपपद्ध साकु द्वारा प्रस्तावित ’एसपीएस’ के मसौदे का कार्यशील मसौदे के रूप में प्रयोग।

7.    भारत-सिंगापुर व्यापक आर्थिक सहयोग अनुबंध (सीईसीए) का द्वितीय पुनरावलोकन

भारत-सिंगापुर सीईसीए के द्वितीय पुनरावलोकन का विमोचन भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री ने 11 मई, 2010 को किया था। द्वितीय पुनरावलोकन की प्रथम सचिवस्तरीय वार्ता 3 अगस्त 2010 को सिंगापुर में हुई थी। उसके बाद, माल एवं सेवाएँ और निवेश के कार्यशील समूहों की बैठक समय-समय पर होती रही। दोनों पक्षों के वार्ताकारों की 8 दौर की अंतरसत्रीय बैठकों के बाद दोनों पक्षों के मुख्य वार्ताकार 1-2 नवम्बर, 2012 को नई दिल्ली में मिले। कुछ बकाया मुद्दों को सुलझाने के लिए वार्ताएँ जारी हैं। 

8.    भारत-चिली अधिमान्य व्यापार समझौते (पीटीए) का विस्तार

भारत एवं चिली के मध्य आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने हेतु एक बुनियादी समझौता 20 जनवरी, 2005 को हस्ताक्षरित किया गया था, जिसकी परिकल्पना एक अधिमान्य व्यापार समझौते (पीटीए) हेतु दो देशों के मध्य एक पहले कदम के तौर पर की गई थी। भारत-चिली पीटीए 8 मार्च, 2006 को हस्ताक्षरित हुआ था एवं यह सितंबर, 2007 में क्रियान्वित हुआ। भारत-चिली पीटीए का विवरण वेबपेज पर शीर्षक पूर्वनिर्णित समझौते पर उपलब्ध है। भारत-चिली अधिमान्य व्यापार समझौते (पीटीए) के विस्तार पर 3री बैठक 30 जून-1 जुलाई, 2011 को चिली में हुई। बैठक के दौरान, पीटीए के विस्तार हेतु व्यापक सिद्धांतों पर दोनों तरफ से सहमति बनी। उन्होंने प्राथमिकता के क्रम में नई इच्छा सूचियों का अदान-प्रदान करने एवं नवंबर, 2011 में अगली बैठक आयोजित करने पर भी रजामंदी दी।

9.    MERCOSUR अधिमान्यता व्यापार समझौता (पीटीए) वार्ता

MERCOSUR दक्षिण अमेरिका क्षेत्र का एक व्यापारिक गुट है जिसमें शामिल देश हैः अर्जेंटिना, ब्राज़िल, पैराग्वे तथा उरूग्वे। यह 1991 में माल सेवा, पूँजी तथा लोगों के स्वतंत्र आवागमन के उद्देश्य के साथ क्रियान्वित हुआ एवं जनवरी 1995 में एक सीमा शुल्क संघ बना। मर्कोसुर का प्रेरणा स्त्रोत यूरोपीय संघ है। यह, यूरोपीय संघ उत्तर अमेरिकी स्वतंत्र व्यापार समझौते (एनएएफटीए) के बाद तीसरा सबसे बड़ा एकीकृत बाजार है। भारत और मर्कोसुर के बीच एक बुनियादी समझौता 17 जून 2003 को असंसियन पैराग्वे में हस्ताक्षरित हुआ जिसमें पहले चरणांतर्गत पारस्परिक तटकर दर वरियता प्रतिपादित करने हेतु वार्ता-तंत्र एवं शर्ते बनाने एवं द्वितीय चरणांतर्गत दो पक्षों के मध्य स्वतंत्र व्यापार पीटीए पर संयुक्त प्रशासनिक समिती (जेएसी) के समझौते के परिपालन एवं विस्तार के विभिन्न पहलूओं पर चर्चा की गई। भारत-मर्कोसुर पीटीए पर जेएसी की द्वितीय बैठक जून, 2010 में संपन्न हुई, जिसमें दोनों पक्षों द्वारा पीटीए के विस्तार हेतु अतिरिक्त विषयवस्तुओं की अपनी ईच्छा-सूचियों का परस्पर आदान-प्रदान किया गया एवं पीटीए के विस्तार के साथ ही इस विषय पर अपने प्रारंभिक प्रस्तावों का आदान प्रदान करने के लिए आगामी तौर-तरीके पर चर्चा की गई।

10.    भारत-पाकिस्तान व्यापारिक समझौता

भारत और पाकिस्तान के पास कोई औपचारिक व्यापार समझौता नहीं है। भारत को पाकिस्तान के प्रति ’सबसे पसंदीदा देश’ स्वीकृत किया गया है, जबकि पाकिस्तान भारत से आयात योग्य वस्तुओं की एक सूची बना रहा है, जिसे ’’सकारात्मक सूची’’ कहा गया है, जिसमें अब 1930 वस्तुऐं शामिल हो चुकी है। दोनों देशों का वाणिज्य सचिवस्तरीय एक संयुक्त अध्ययन दल (जेएसजी) गठित किया गया है। 27-28 अप्रैल 2011 को इस्लामाबाद में भारत और पाकिस्तान के वाणिज्य सचिवों के मध्य द्विपक्षीय व्यापार एवं वाणिज्यिक बातचीत सम्पन्न हुई। दोनों पक्षों ने, अन्य बातों के साथ-साथ, व्यापारिक ढ़ाँचे एवं अटारी-वाघा भू-मार्ग से व्यापार-विस्तार पर परस्पर सहमति व्यक्त की। यह व्यापार की क्षेत्र-विशेष की बाधाओं को सुनने और उन्हें निराकरित करने हेतु कार्यकारी-दल स्थापित करने पर रजामंद था। दोनों पक्ष इस मुद्दे पर भी रजामंद थे कि पेट्रोलियम पदार्थ में व्यापार विस्तार की तरह ही बिजली एवं बी.टी. कपास बीजों के सक्षम व्यापार प्रारंभ करने की पहल की जाए। संयुक्त कार्यकारी दल का गठन सीमा (शुल्क) सहयोग, बिजली व्यापार एवं सभी प्रकार के पेट्रोलियम पदार्थो के व्यापार हेतु किया गया। ’’आर्थिक तथा वाणिज्यिक सहयोग एवं व्यापार-विकास’’ पर एक संयुक्त कार्यकारी दल जो वाणिज्य के संबंधित विभागों के संयुक्त सचिवों की सह-अध्यक्षता में स्थापित किया गया, जिसमें दो वाणिज्य सचिवों की बैठक के दौरान लिए गए निर्णयों के परिपालन के पुनरावलोकन का कार्य तथा अन्य व्यापार विकास मुद्दों का कार्य भी हो सके। पाकिस्तान ने यह मान्यता दे दी कि ’सबसे पंसदीदा देश’ के रूप में भारत की स्थिती द्विपक्षीय व्यापारिक रिश्तों के विस्तार में मदद करेगी। इसके द्वारा अक्टूबर 2011 में यह सहमति हो गई कि वर्तमान ’सकारात्मक सूचि’ को ’नकारात्मक सूची’ से बदल दिया जाए। किंतु 2019 तक, सभी व्यापार संबंध पूरी तरह से समाप्त कर दिये जा चुके थे। 

11.    भारत-यूरोपीय संघ व्यापक आधार व्यापार एवं विनिवेश समझौता (बीटीआईए) वार्ता

28 जून 2007 को, भारत एवं यूरोपीय संघ ने ब्रूसेल्स, बेल्ज़ियम में व्यापक आधारभूत व्यापार एवं विनिवेश समझौते (बीटीआईए) पर वार्ता प्रारंभ की। भारत एवं यूरोपीय संघ तमाम आर्थिक क्षेत्रों में माल, सेवाओं एवं विनिवेश के व्यापार में आ रही बाधाओं को दूर करके द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने के प्रति आशान्वित थे। दोनों पक्ष इस पर सहमत थे कि एक सर्वग्राही एवं महत्वकांक्षी समझौता, जो विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों एवं उद्देश्यों का विरोधगामी नहीं हो, भारत और यूरोपीय संघ व्यापार के लिए एक नया बाज़ार खोलेगा एवं दोनों के लिए अवसरों को बढ़ाएगा। वार्ता में इन बातों को शामिल किया गया- माल व्यापार, सेवा व्यापार, पूँजी निवेश, स्वास्थ्य एवं पादप स्वास्थ्य मानक, व्यापार की तकनीकी बाधाएँ, व्यापार उपचार, उत्पत्ति के नियम, सीमा-शुल्क एवं व्यापार सरलीकरण, प्रतिस्पर्धा, व्यापार सुरक्षा, सरकारी खरीद, विवाद-निपटारा, बौद्धिक संपदा अधिकार व भौगोलिक सूचनाएँ, सतत् विकास। अभी तक, बारी-बारी से ब्रूसेल्स एवं नई दिल्ली में वार्ता के 15 दौर आयोजित हो चुके हैं। पिछली बैठक 13 मई, 2013 वाले सप्ताह में नई दिल्ली में आयोजित हुई थी।

12.    भारत यूरोपीय स्वतंत्र व्यापार संघ (ईएफटीए) व्यापक आधारभूत व्यापार एवं पूँजी निवेश समझौता (बीटीआईए) वार्ताओं पर संक्षिप्त ब्यौरा

यूरोपीय स्वतंत्र व्यापार संघ (ईएफटीए) स्वतंत्र व्यापार के विकास एवं बहुतायतता के लिए एक अंतर्सरकारी संस्थान है। ईएफटीए उन राज्यों के लिए वैकल्पिक रूप में स्थापित की गई जो यूरोपीय समुदाय (ईसी) में शामिल होने की ईच्छा नहीं रखते थे। ईएटीए 3 मई, 1960 को स्टॉकहोम सम्मेलन के द्वारा आस्ट्रीया, डेनमार्क, ग्रेट ब्रिटेन, नॉर्वे, पुर्तगाल, स्वीड़न एवं स्वीट्जरलैण्ड़ को साथ लेकर स्थापित की गई। ईएफटीए की वर्तमान सदस्यता चार देशों तक सीमित है- स्वीट्जरलैण्ड़, नॉर्वे, आईसलैंड़ एवं लिकटेंस्टीन। ये देश यूरोपीय संघ का हिस्सा नहीं है। वार्ताः- निम्नवर्णित रास्तों पर अभी वार्ता चल रही है - माल एवं सेवा व्यापार, स्वास्थ्य एवं पादप-स्वास्थ्य (एसपीएस) मानक, व्यापार की तकनीकी बाधाएँ (टीपीटी), सीमा शुल्क एवं दर-सूची सरलीकरण (टीएफ), पूँजी निवेश, बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआरएस), प्रतिस्पर्धा, सरकारी खरीदी (जीपी), विवाद-निपटारा (डीएस), व्यापार सुरक्षा (एसड़ी) एवं कानूनी व क्षैतिज। अभी तक भारत-ई एफटीए बीटीआईए वार्ता के 13 दौर संपन्न हो चुके हैं। 

13.    व्यापार वरीयता की वैश्विक प्रणाली (जीएसटीपी)

यह समझौता व्यापार वरीयता की वैश्विक प्रणाली (जीएसटीपी) की प्रथम दौर की वार्ता के निष्कर्षों के अनुपालन में विकासशील देशों के मध्य 13 अप्रैल, 1988 को बेलग्रेड़ में हस्ताक्षरित हुआ। जीएसटीपी, समूह 77 के मंत्रीगणों की बैठक के दौरान हुई वार्ताओं की एक लंबी प्रक्रिया के बाद अस्तित्व में आया, जिनमें विशेष रूप से 1976 में मेक्सिको शहर, 1981 में केरकस की बैठक अहम् है। जुलाई 2014 में 44 सदस्य देशों में से 8, जिनमें भारत भी है, ने मसौदे पर हस्ताक्षर किए। इन 8 देशों में से तीन देशों अर्थात् भारत, मलेशिया एवं क्यूबा ने इसकी पुष्टि कर दी। आर्थिक मामलों की मंत्रालयीन समिति (सीसीईए) ने तीसरे दौर की वार्ता के अंतर्गत भारत की रियायतों की अनुसूची अनुमोदित कर दी।


14.    एशिया प्रशांत क्षेत्रीय व्यापार समझौता (एपीटीए) एशिया प्रशांत क्षेत्रीय व्यापार समझौता (पूर्ववर्ती नाम-बैंकॉक समझौता)

संयुक्त राष्ट्र के एशिया प्रशांत क्षेत्रीय विकासशील सदस्य देशों को मिलाकर रियायतों की अनुसूची के अदान-प्रदान के द्वारा व्यापार विस्तार के लिए आर्थिक एवं समाजिक आयोग (तदर्थ एशिया व प्रशांत क्षेत्र) (ईएससीएपी) के अधीन एक पहल है। चीन ने समझौते को 2000 में मान लिया और एपीटीए के वर्तमान सदस्यों में बांग्लादेश, चीन, भारत, लाओ पीडीआर, कोरिया गणराज्य एवं श्रीलंका सम्मिलित हैं। स्थाई समिति वार्ताकार/क्रियान्वयनकारी निकाय है, जो मंत्रालयीन परिषद के दिशानिर्देश एवं मार्गदर्शन के तहत् कार्य करता है। संयुक्त राष्ट्र ईएससीपी समझौते के लिए सचिवालय के तौर पर कार्य करता है। मंत्रालयीन समिति के अध्यादेश के अनुरूप, स्थाई समिति ने निम्न क्षेत्रों पर वार्ता आरंभ कीः

  • माल की दर सूची में रियायतों पर वार्ताएँ
  • व्यापार सरलीकरण पर बुनियादी समझौते पर वार्ताएँ
  • सेवा व्यापार पर बुनियादी समझौते पर वार्ताएँ
  • पूँजी निवेश पर बुनियादी समझौते पर वार्ताएँ
  • एपीटीए की सदस्यता-विस्तार की संभावनाओं की खोज करना

व्यापार सरलीकरण, निवेश एवं सेवाओं हेतु बुनियादी समझौते पर हुई वार्ताओं का निष्कर्ष निकल चुका है। सम्मिलित राष्ट्रों द्वारा सभी तीनों समझौते हस्ताक्षरित कर पुष्टि कर दिए गए हैं। मंत्रालयीन समिति का तीसरा सत्र सिओल में 15 दिसंबर 2009 को संपन्न हुआ। भारतीय प्रतिनिधिमंड़ल का नेतृत्व श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, तत्कालीन राज्य मंत्री, वाणिज्य एवं उद्योग द्वारा किया गया। वार्ताओं के चौथे दौर के तहत् सम्मिलित राष्ट्र अभी भी वरीयताओं की औसत गुंजाईश (एमओपी) एवं अनुसूची-पद्धति की व्याप्ति पर वार्तारत् हैं। 

15.    भारत-न्यूजीलैण्ड स्वतंत्र व्यापार समझौता/व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता

संयुक्त अध्ययन दल (जेएसजी) की अनुशंसा एवं व्यापार एवं आर्थिक संबंध समिति (टीईआरसी) के बाद अनुमोदन पर आधारित, भारत-न्युज़ीलैण्ड व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते जिसमें माल-व्यापार, सेवा, पूँजी निवेश एवं संबंधित मुद्दे हैं, पर भारत वार्ता कर रहा है। अभी तक वार्ता के 9 दौर संपन्न हो चुके हैं। नई दिल्ली में 9-10 दिसम्बर, 2013 को एक अंतरसत्रीय चर्चा के अनुपालन में वार्ता का 9 वाँ दौर जुलाई, 2013 को वेलिंगटन (न्यूज़ीलैण्ड) में आयोजित हुआ।

16.    भारत-कनाड़ा व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (सीईपीए)

सितंबर 2008 में, भारत-कनाड़ा सीईओ गोलमेज़ ने अनुशंसा की कि भारत और कनाड़ा को द्विपक्षीय व्यापर के एक पर्याप्त बहुमत पर अनुसूची विलोपन द्वारा बड़ा फायदा होगा। सीईपीए में शामिल है - माल-व्यापार, सेवा-व्यापार, उत्पत्ति के नियम, स्वास्थ्य एवं पादप स्वास्थ्य मानक, व्यापार वार्ता के आठ दौर अपनी जगह बना चुके हैं। 8 वाँ दौर 24 से 26 जून, 2013 को ओटावा, कनाड़ा में संपन्न हुआ।

17.    भारत-ऑस्ट्रेलिया व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता (सीईसीए)

अभी तक भारत-ऑस्ट्रेलिया सीईसीए वार्ताओं के पाँच दौर हो चुके है। पहला दौर जुलाई, 2011 में तथा अंतिम अर्थात 5 वाँ दौर 20-21 मई, 2013 को कैनबरा (ऑस्ट्रेलिया) में संपन्न हो चुका है।

18.    भारत-इंड़ोनेशिया व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता (सीईसीए)

इंड़ोनेशिया के राष्ट्रपति के नई दिल्ली आगमन के दौरान 25 जनवरी, 2011 को भारत-इंडोनेशिया सीईसीए के प्रारंभ की उद्घोषणा की गई। सीआईटीएम के इंड़ोनेशिया दौरे के दौरान 3-4 अक्टूबर 2011 को दोनों पक्षों के द्वारा भारत-इंड़ोनेशिया सीईसीए हेतु वार्तापूर्व मंत्रणा की गई।

19.    भारत पर संयुक्त अध्ययन-सीओएमईएसए (पूर्व और दक्षिणी अफ्रीका के लिये आय बाज़ार) 

भारत और सीओएमईएसए पूर्व और दक्षिणी अफ्रीका के लिये आय बाज़ार (सीओएमईएसए) के बीच अधिमान्य व्यापार समझौता (पीटीए/स्वतंत्र व्यापार समझौते (एफटीए) की व्यवहार्यता को जाँचने के लिये संयुक्त अध्ययन समूह (विवरण), अफ्रीका का सबसे बड़ा आर्थिक समुदाय है जिसमें 19 सदस्य देश शामिल हैं जिनके नाम हैं बुरून्डी, कोमोरोस, डीआर काँगो, जिबूती, मिश्र, इरिट्रिया, इथोपिया, केन्या, लीबिया, मेडागास्कर, मलावी, मारिशस, रवान्डा, सिचलिस, स्वाजोलेंड, सूडान, उगान्डा, जामिब्या और जिम्बाब्वे। भारत-सीओएमईएसए संयुक्त अध्ययन समूह की पहली बैठक 30-31 जौलाई, 2012 को लुसाका में हुई थी। जेएसजी की पहली बैठक में यह निर्णय लिया गया था कि भारत-सीओएमईएसए संयुक्त अध्ययन समूह एक संयुक्त विवरण तैयार करेगा, जिसमें भारत सरकार और सीओएमईएसए सचिवालय के विचार करने के लिये उसकी सिफारशें शामिल होगी।

20.    भारत-इज़रायल स्वतंत्र व्यापार समझौता (एफटीए) वार्ता

भारत और इज़रायल स्वतंत्र व्यापार समझौता पर वार्ता कर रहे हैं। पहली वार्ता का दौर 26 मई, 210 को नई दिल्ली में सम्पन्न हुआ था। तब से वार्ता के आठ दौर हो चुका हैं। वार्ता का आठवाँ दौर 24 से 26 नवम्बर, 2013 तक इज़रायल में चला था।

21.    क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी पर संक्षिप्त ब्यौरा (आरसीईपी) 

क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आसीईपी) एक व्यापक स्वतंत्र व्यापार समझौता है जिसकी 10 आसीआन (एएसईएएन) सदस्य देश और एएसईएएन स्वतंत्र व्यापार समझौता (एफटीए) भागीदार जिनके नाम हैं ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान कोरिया और न्यूज़ीलेंड के बीच वार्ता हो रही है। आसीईपी वैशविक स्तर पर उभरते व्यापार और आर्थिक शिल्प को दर्शाता है। इसे एकाकीपन में नहीं देखना चाहिये बल्कि दूसरे उभरते व्यापक स्वतंत्र व्यापार समझौतों के संदर्भ में देखना चाहिये जैसे कि ट्रन्स पेसेफिक पार्टनरशिप (टीपीपी) और नई-नई शुरू हुई ट्रन्स अटलांटक ट्रेड एण्ड इन्वेस्टमेंट पार्टनशिप (टीटीआईपी) जिसमें अमेरिका और यूरोपीय संघ शामिल हैं। वैश्विकस्तर पर व्यापक क्षेत्रीय व्यापार व्यवस्थाओं के संदर्भ में, टीटीपी, टीटीआईपी के साथ पश्चिमी भाग की देखभाल करेगी, टीटीआईपी को केन्द्रीय भाग मानते हुए और आसीईपी को पूर्वी भाग मानते हुए। इसलिये भारत के लिये इसके पूर्वान्मुखी सिद्धांत और समझौते के व्यापक स्वभाव इन दोनों संदर्भ में आरसीईपी का सामरिक महत्व है। 

जून 2013 से पूर्व, एएसईएएन (आसियान) और एफटीए पार्टनस् सीनियर एकोनोमिक आफिसियल मीटिंगस् (एसईओएम) के अधीन आरसीईपी की गतिविधियाँ चलती थी जिसकी जगह अब आरसीईपी ट्रेड निगोशियेटिंग कमिटी (आरसीईपी-टीएनसी) ने ले ली है। ’’निगोशियेटिंग आरसीईपी के लिये मार्गदर्शक सिद्धान्त और उद्देश्य’’ को अगस्त 2012 में, आर्थिक मंत्रियों ने अंगीकृत किया, जिसमें मौजूदा एफटएस् के ऊपर, महत्वपूर्ण विकास के साथ व्यापक और गहन अनुबंध जैसे सिद्धांतों का उल्लेख किया गया हैं। जिससे देशों की व्यक्तिगत और विविध परिस्थितियों को पहचाना जा सके। देशों की वैश्विक और क्षेत्रीय आपूर्ति श्रृखलाओं के साथ अनुबंध में सहायता की जा सके, साथ ही भागीदारी करने वाले देशों के विकास के विभिन्न स्तरों को संज्ञान में लिया जा सके इत्यादी। इसके साथ ही यह वस्तुओं, सेवाओं, निवेश आर्थिक और तकनीकी सहयोग, बौद्धिक संपत्ति, प्रतिस्पर्धा और विवाद निपटान इत्यादि क्षेत्रों को समझौतावार्ता के लिये चिन्हित करना है साथ ही दूसरे क्षेत्रों को लचक के साथ चिन्हित करता है।

जबकि तीन कार्यरत समूह, जो हैं, वर्किंग ग्रुप ऑन ट्रेड इन गुड्स (डब्ल्यूजीटीआईजी), वर्किंग गु्रप ऑन ट्रेड इन सर्विसेज़ (डब्ल्युजीटीआईएस) और वर्किंग ग्रुप ऑन इन्वेस्टमेंट (डब्ल्युजीआई) को एएफपी एसईओएस परामर्श प्रक्रिया के अन्तर्गत खड़ा किया गया था, तीन नये कार्यरत समूहों, प्रतिस्पर्धा, बौद्धिक संपत्ति और आर्थिक और तकनीकी सहयोग (ईसीओटीईसीएच) पर, आरसीईपी की चौथी बैठक, जो 31 मार्च से 4 अप्रैल, 2014 तक नैनिंग, चीन में संपन्न हुई थी, उसमें स्थापित किये गये थे। 

एक नया कार्यरत समूह ’’लीगल एण्ड इंस्टिट्यूटशनल इसूज़’’ पर आरसीईपी की 5वीं बैठक में स्थापित हुआ था, जो सिंगापुर में 21-27 जून, 2014 को संपन्न हुआ। चार उप कार्यरत समूह रूल्स ऑफ आरीजिन (आरओओ), कस्टम प्रोसीजरम् (आगमन शुल्क उत्तपत्ति के नियम) प्रकिया) और व्यापार सरलीकरण (सीपीटीएफ), एसपीएस (सेनिटरी और फाईटोसेनिटरी मेज़रमस्) और एसटीआरएसीएपी (मानक, तकनीकी नियम और अनुकूलता अनुमान कार्यविधियाँ), को स्थापित किया गया है, जो कार्यरत समूह को वस्तुओं के व्यापार के बारे में विवरण देते हैं। इसलिये टीएनसी के अतिरिक्त, संस्थान के रूप में 7 कार्यरित समूह और 4 उप कार्यरत समूह हैं। छठवीं आरसीईपी बैठक दिसम्बर, 2014 में भारत में सम्पन्न हुई थी।

मुद्दे जिन पर विचार हुआः कुछ मुख्य विषय जिन पर कार्यरत समूह में विचार-विमर्श हुआ वह हैं, वस्तुओं पर सीमा शुल्क के तौर-तरीके, सेवाओं और निवेश को नामांकन सूची, आरसीईपी अध्याय के तत्व और उस पर संभव विषय वस्तु बौद्धिक संपत्ति, प्रतिस्पर्धा, आर्थिक और तकनीकी सहयोग, कानूनी और संस्थागपत मुद्दों, आगमन शुल्क कार्यविधियाँ और व्यापार सरलीकरण, उत्तपत्ति के नियम इत्यादी।

4.0 अक्सर पूछे गये प्रश्न 

प्रश्नः बहुपक्षवाद (विश्व व्यापार संगठन) और एफटीए के बीच क्या संबंध है?

उत्तरः वस्तुओं के लिए गैट का अनुच्छेद 24, गैट जीएटीटी, (प्रशुल्क एवं व्यापार पर सामान्य समझौता) का अनुच्छेद 1 जो विश्व व्यापार संगठन के 

सर्वाधिक पसंदीदा देश (एमएफएन) सिद्धांत का प्रतिपादन करता है, कहता है कि ‘‘किसी भी अनुबंध करने वाले पक्ष द्वारा किसी भी अन्य देश में उत्पन्न होने वाले या किसी भी गंतव्य देश के लिए किसी उत्पाद को कोई भी लाभ, अनुग्रह, विशेषाधिकार या छूट प्रदान की जाती है तो वह उसी प्रकार के उत्पाद को, जो किसी अन्य देश में उत्पन्न हुआ है या किसी अन्य गंतव्य देश के लिए है, सभी अनुबंध करने वाले पक्षों के प्रदेशों के लिए भी तत्काल और बिनाशर्त प्रदान की जानी चाहिए।‘‘

हालांकि, इस एमएफएन सिद्धांत की अप्रतिष्ठा की अनुमति विशिष्ट स्थितियों में विश्व व्यापार संगठन के समझौतों के निम्नलिखित प्रावधानों के अनुसार एफटीए के निर्माण के लिए प्रदान की जाती हैः

  • वस्तुओं के लिए गैट (जीएटीटी) का अनुच्छेद 24 
  • सेवाओं के लिए जीएटीएस (सेवाओं में व्यापार के लिए सामान्य समझौता) का अनुच्छेद 5 

जीएटीटी के अनुच्छेद 24 के तहत एफटीए की अनुमति देने वाली विशिष्ट स्थितियां निम्नानुसार हैंः

  • एफटीए सदस्य देश गैर-सदस्य देशों के साथ व्यापार पर ऐसी बाधाओं से अधिक उच्च या अधिक प्रतिबंधक प्रशुल्क या गैर-प्रशुल्क बाधाएं निर्मित नहीं करेंगे जो एफटीए के निर्माण से पूर्व विद्यमान थीं। 
  • प्रशुल्कों और अन्य व्यापार प्रतिबंधों का उन्मूलन ‘‘ऐसे प्रदेशों में उत्पन्न होने वाले उत्पादों में घटक प्रदेशों के बीच होने वाले काफी हद तक संपूर्ण व्यापार‘‘ पर लागू किया जाना चाहिए। 
  • एफटीए के अंतर्गत होने वाले व्यापार पर शुल्कों और अन्य व्यापार निर्बंधों का उन्मूलन ‘‘समय की एक उचित अवधि के भीतर‘‘ पूर्ण किया जाना चाहिए, जिसका अर्थ है 10 वर्ष से अधिक अवधि का समय नहीं। 

साथ ही ‘‘समर्थंकारी उपधारा‘‘ विकासशील देशों को अनुच्छेद 24 की शर्तों का पालन किये बिना व्यापार व्यवस्थाएं बनाने की अनुमति देती है।

प्रश्नः मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) क्या हैं?

उत्तरः एफटीए दो या अधिक देशों या व्यापार गुटों के बीच वे व्यवस्थाएं होती हैं जो उनके बीच होने वाले काफी हद तक पर व्यापार पर मुख्य रूप से सीमा शुल्क, प्रशुल्क और गैर-प्रशुल्क बाधाएं कम करने उन्हें पूर्णतः समाप्त करने पर सहमत होती हैं। एफटीए में आमतौर पर वस्तु व्यापार (जैसे कृषि या औद्योगिक उत्पाद) या सेवा व्यापार (जैसे बैंकिंग, निर्माण, ट्रेडिंग इत्यादि) शामिल होता है। एफटीए में अन्य क्षेत्रों को भी शामिल किया जा सकता है जैसे बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर), निवेश, सरकारी खरीद और प्रतिस्पर्धा नीति इत्यादि।

प्रश्नः पीटीए, सीईसीए, आरटीए, सीईपीए, सीमाशुल्क संघ, साझा बाजार और आर्थिक संघ जैसे शब्दों के बीच क्या अंतर है? ये शब्द एफटीए से किस प्रकार संबंधित हैं?

उत्तरः

  1. अधिमान्य व्यापार समझौता (पीटीए): पीटीए में दो या अधिक भागीदार स्वीकृत संख्या में उत्पादों पर प्रशुल्क कम करने पर सहमत होते हैं। उत्पादों की वह सूची जिस पर भागीदार शुल्क कम करने पर सहमत हुए हैं उसे सकारात्मक सूची कहा जाता है। भारत एमईआरसीओएसयूआर पीटीए इसका एक उदाहरण है। हालांकि सामान्य रूप से पीटीए काफी हद तक सारे व्यापार को शामिल नहीं करते। 
  2. मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए): एफटीए में भागीदारों के बीच काफी हद तक द्विपक्षीय व्यापार को समाविष्ट करने वाले मदों पर प्रशुल्क समाप्त किये जाते हैं; हालांकि प्रत्येक पक्ष गैर-सदस्यों के लिए अपनी व्यक्तिगत प्रशुल्क संरचना बनाये रखता है। भारत-श्रीलंका एफटीए इसका एक उदाहरण है। एफटीए और पीटीए के बीच मुख्य अंतर यह है कि जहाँ पीटीए में उन उत्पादों की एक सकारात्मक सूची होती है जिन पर शुल्क कम करना है; एफटीए में एक नकारात्मक सूची होती है जिसपर शुल्क कम या समाप्त नहीं किया जाता। इस प्रकार, पीटीए की तुलना में एफटीए आमतौर पर उन उत्पादों के समावेश की दृष्टि से अधिक महत्वाकांक्षी होते हैं जिन पर शुल्क कम करना है।
  3. विस्तृत आर्थिक सहयोग समझौता (सीईसीए) और विस्तृत आर्थिक भागीदारी समझौता (सीईपीए): ये शब्द उन समझौतों का वर्णन करते हैं जिनमें वस्तुओं, सेवाओं और निवेश, साथ ही आईपीआर, प्रतिस्पर्धा इत्यादि जैसे अन्य क्षेत्रों सहित एक एकीकृत संकुल (पैकेज) होता है। भारत कोरिया सीईपीए इसका एक उदाहरण है और इसमें अन्य क्षेत्रों की एक व्यापक श्रृंखला शामिल होती है जैसे व्यापार सरलीकरण और सीमाशुल्क सहयोग, निवेश, प्रतिस्पर्धा, आईपीआर इत्यादि। 
  4. सीमाशुल्क संघः एक सीमाशुल्क संघ में भागीदार देश परस्पर शून्य शुल्क पर व्यापार करने का निर्णय ले सकते हैं, हालांकि साथ वे समान प्रशुल्क बनाये रखते हैं। इसका एक उदाहरण है दक्षिण अफ्रीका, लेसोथो, नामीबिया, बोत्सवाना और स्विट्जरलैंड के बीच का दक्षिण अफ्रीकी सीमाशुल्क संघ (एसएसीयू) यूरोपीय संघ भी इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है। 
  5. साझा बाजारः साझा बाजार द्वारा प्रदत्त एकीकरण सीमाशुल्क संघ द्वारा प्रदत्त एकीकरण की तुलना में एक कदम अधिक गहरा होता है। साझा बाजार एक सीमाशुल्क संघ है जिसमें श्रम और पूँजी के मुक्त प्रवाह के सरलीकरण, तकनीकी मानदंडों के सामंजस्य इत्यादि के प्रावधान होते हैं। यूरोपीय साझा बाजार इसका एक उदाहरण है।
  6. आर्थिक संघः आर्थिक संघ एक ऐसा साझा बाजार है जिसे राजकोषीय/मौद्रिक नीतियों और साझा कार्यकारी, न्यायिक और विधायी संस्थाओं के अधिक सामंजस्य के माध्यम से विस्तारित किया जाता है यूरोपीय संघ (ईयू) इसका एक उदाहरण है।

प्रश्नः शीघ्र कटाई योजना/कार्यक्रम (ईएचएस) क्या है और यह एफटीए से कितनी अलग है?

उत्तरः शीघ्र कटाई योजना दो व्यापार भागीदारों के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) की पूर्ववर्ती है। यह दोनों व्यापारी देशों को मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) की चर्चाओं के समापन के लंबित रहने की स्थिति में प्रशुल्क उदारीकरण के लिए कुछ विशिष्ट उत्पादों की पहचान करने में सहायता के लिए है। मूल रूप से यह एक विश्वास निर्माण के उपाय के रूप में होती है। ईएचएस का एक अच्छा उदाहरण भारत और थाईलैंड के बीच अक्टूबर 2003 में संपन्न हुआ था। जिसमें ऐसे 83 उत्पादों की पहचान की गई थी जिनपर चरणबद्ध ढंग से शून्य तक कमी की जानी थी। ईएचएस का उपयोग व्यापार भागीदारों के बीच अधिक विश्वास निर्माण के तंत्र के रूप में किया गया है, ताकि वे और अधिक बड़ी आर्थिक भागीदारी करने की दृष्टि से तैयार हो सकें।

प्रश्नः एफटीए के तहत प्रशुल्क न्यूनीकरण विश्व व्यापार समझौता (डब्लूटीओ) प्रशुल्क वार्ता से किस प्रकार भिन्न है?

उत्तरः एफटीए के प्रयोजन के लिए ‘‘आधार दर‘‘ जारी जाने वाली वार्ता/चरणबद्धता के सभी पहलुओं में एक महत्वपूर्ण घटक है। आधार दर किसी भी वर्ष की अनुप्रयुक्त एमएफएन शुल्क है जिसका निर्धारण परस्पर किया जाता है। एफटीए में प्रशुल्क न्यूनीकरण आमतौर पर आधार दर के संदर्भ में किया जाता है अर्थात अनुप्रयुक्त एमएफएन प्रशुल्कों में से। हालांकि विश्व व्यापार समझौता वार्ताएं हमेशा ‘‘बाध्यकारिता शुल्क दरों‘‘ पर आधारित होती हैं न कि एमएफएन अनुप्रयुक्त शुल्कों पर।

प्रश्नः सीईसीए/सीईपीए एफटीए से किस प्रकार भिन्न है?

उत्तरः विस्तृत आर्थिक सहयोग समझौता (सीईसीए) या विस्तृत आर्थिक भागीदारी समझौता (सीईपीए) दो मामलों में पारंपरिक मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) से भिन्न है। 

  • सीईसीए/सीईपीए एफटीए से क्षेत्रों के समावेश और प्रतिबद्धताओं के प्रकारों की दृष्टि से अधिक विस्तृत होते हैं। जबकि एक पारंपरिक एफटीए मुख्य रूप से वस्तुओं पर केंद्रित होता है वहीं एक सीईसीए/सीईपीए सेवाओं, निवेश, प्रतिस्पर्धा, सरकारी खरीद, विवाद इत्यादि जैसे आने क्षेत्रों के समग्र समावेश की दृष्टि से अधिक महत्वाकांक्षी होता है। 
  • सीईसीए/सीईपीए एफटीए की तुलना में व्यापार के नियामक पहलुओं को अधिक गहराई से देखता है। इसी के कारण इसमें परस्पर मान्यता समझौतों (एमआरए) का भी समावेश होता है जो भागीदारों के नियामक शासनों को भी समाविष्ट करता है। एमआरए इस मान्यता पर भागीदारों के भिन्न-भिन्न नियामक शासनों को मान्यता देता है कि वे एकसमान अंतिम उद्देश्यों को प्राप्त करते हैं। 

प्रश्नः लगभग सभी देश मुक्त व्यापार समझौते क्यों कर रहे हैं?

उत्तरः विभिन्न देश अनेक कारणों से मुक्त व्यापार समझौतों की चर्चा करते हैं। 

  • प्रशुल्कों और कुछ गैर-प्रशुल्क बाधाओं को समाप्त करने से भागीदारों एक दूसरे के बाजारों में आसान बाजार अभिगम्यता प्राप्त हो जाती है। 
  • निर्यातक बहुपक्षीय व्यापार उदारीकरण की तुलना में एफटीए को अधिमान्यता देते हैं क्योंकि उन्हें गैर-एफटीए सदस्यों की तुलना में अधिमान्य व्यवहार प्राप्त होता है। उदाहरणार्थ आसियान के मामले में आसियान का भारत के साथ एफटीए है परंतु कनाडा के साथ नहीं है। चमडे के जूतों पर आसियान का सीमाशुल्क 20 प्रतिशत है परंतु भारत के साथ हुए एफटीए के तहत उसने शुल्कों को शून्य तक कम कर दिया। अब यह मानते हुए कि अन्य सभी लागतें समान हैं, एक भारतीय निर्यातक, उसकी शुल्क अधिमान्यता के कारण, जूतों के एक कनाडाई निर्यातक की तुलना में अधिक प्रतिस्पर्धी होगा। दूसरा, एफटीए स्थानीय निर्यातकों को उन विदेशी कंपनियों से होने वाली व्यापार हानि से संरक्षण भी प्रदान कर सकता है जिन्हे अन्य एफटीए के तहत अधिमान्य व्यवहार प्राप्त है। 
  • एफटीए के बाहर से बढे़ हुए विदेशी निवेश की संभावना। 2 ऐसे देशों ए और बी का विचार करें जिनका आपस में एफटीए है। देश ए के प्रशुल्क उच्च हैं और उसका घरेलू बाजार काफी विशाल है। देश सी में स्थित कंपनी देश ए में निवेश करने का निर्णय ले सकती है, ताकि वह ए के घरेलू बाजार की आवश्यकताओं की पूर्ती कर सके। हालांकि यदि ए और बी एक एफटीए पर हस्ताक्षर कर देते हैं और देश बी बेहतर व्यापार पर्यावरण प्रस्तुत करता है, तो सी अपना संयंत्र देश बी में लगाने का निर्णय ले सकता है क्योंकि वहां उत्पादित उत्पादों की वह देश ए में आपूर्ति कर सकता है। 
  • इस प्रकार की घटनाएं केवल प्रशुल्कों तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि यह गैर-प्रशुल्क उपायों के संबंध में भी सही है। विशेष रूप से जब ए और बी देश के बीच एक परस्पर मान्यता समझौता (एमआरए) संपन्न हो चुका है। कुछ विशेषज्ञों का विचार यह है कि बड़ी संख्या में देश होने के कारण निर्माण होने वाली जटिलताओं के कारण बहुपक्षीय समझौता वार्ताओं की धीमी प्रगति से ध्रुवीकरण वाले मुद्दों पर आमसहमति बन पाना कठिन होता है इसी कारण से एफटीए को प्रोत्सान प्राप्त होता होगा।

प्रश्नः अपने द्विपक्षीय पीटीए/एफटीए/सीईसीए/सीईपीए की दृष्टि से भारत की वैश्विक स्थिति क्या है?

उत्तरः भारत के लगभग 54 व्यक्तिगत देशों के साथ अधिमान्य अधिगम्यता, आर्थिक सहयोग और मुक्त व्यापार समझौते हैं। भारत ने लगभग 18 समूहों/देशों के साथ विस्तृत आर्थिक भागीदारी समझौतों (सीईपीए)/विस्तृत आर्थिक सहयोग समझौतों (सीईसीए)/अधिमान्यता व्यापार समझौतों (पीटीए) किये हैं। काफी हद तक संपूर्ण व्यापार को शामिल करने वाले विस्तृत अधिमान्यता प्रशुल्क समझौतों का समापन करने में भारत एक विलंबित और सावधान आरंभक है। 

प्रश्नः उत्पत्ति के नियम (आरओओ) क्या हैं?

उत्तरः उत्पत्ति के नियम (आरओओ) अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रयोजन से किसी उत्पाद की उत्पत्ति को निर्धारित करने के लिए आवश्यक मानदंड हैं। उनका महत्त्व इस तथ्य से व्युत्पन्न होता है कि अनेक मामलों में शुल्क और निर्बंध आयात के स्रोत पर निर्भर करते हैं। 

उत्पत्ति के नियमों का उपयोग निम्न कार्यों के लिए किया जाता हैः

  1. वाणिज्यिक नीति के रशिपातन विरोधी शुल्कों और सुरक्षा उपायों के उपायों और साधनों के क्रियान्वयन के लिए य
  2. यह निर्धारित करने के लिए कि आयातित उत्पादों को सर्वाधिक पसंदीदा देश (एमएफएन) व्यवहार प्राप्त होगा या अधिमान्यता व्यवहार य
  3. व्यापार आंकडों के प्रयोजन के लिए;
  4. लेबलिंग और अंकन आवश्यकताओं के अनुप्रयोग के लिए; और 
  5. सरकारी खरीद के लिए 

प्रश्नः उत्पत्ति के नियमों में उपयोग किये जाने वाले कुछ मानदंड क्या हैं?

उत्तरः उत्पत्ति के नियमों के मानदंड प्रसंस्करण के स्तर पर उन विशिष्ट और विस्तृत शर्तों का निर्धारण करते हैं जिनसे किसी गैर-एफटीए भागीदार से आयातित मद को एफटीए भागीदार देश (या क्षेत्र के अन्य पात्र देशों) में गुजरना होता है ताकि वे किसी एफटीए भागीदार देश के उत्पन्न उत्पाद कहलाने के लिए पात्र बन सकें। 

उपयोग किये जाने वाले कुछ सामान्य मानदंड हैं -

  1. प्रशुल्क वर्गीकरण में परिवर्तन (यह प्रशुल्क अध्याय, प्रशुल्क शीर्षक या प्रशुल्क उप-शीर्षक स्तर पर हो सकता है)
  2. क्षेत्रीय मूल्य संवर्धन 
  3. कुछ न्यूनतम संचालनों के अपवर्जन द्वारा काफी हद तक विनिर्माण या प्रसंस्करण 

प्रश्नः एफटीए के संदर्भ में उत्पत्ति के नियम क्यों महत्वपूर्ण हैं?

उत्तरः एफटीए के तहत अधिमान्यता प्रशुल्क के अनुप्रयोग का मूल्यांकन करने के संदर्भ में उत्पत्ति के नियम महत्वपूर्ण हैं। अतः उत्पत्ति के नियमों के बिना एफटीए के तहत अधिमान्यता प्रशुल्क क्रियान्वित नहीं किये जा सकते। साथ ही एफटीए के गैर-सदस्यों को एफटीए भागीदारों के बीच स्वी.त अधिमान्यता प्रशुल्कों का लाभ प्रदान नहीं किया जाता। 

प्रश्नः एफटीए में उत्पत्ति के नियमों का प्रवर्तन किस प्रकार किया जाता है?

उत्तरः उत्पत्ति के नियमों का प्रवर्तन व्यापार भागीदार के किसी अधिकृत अभिकरण द्वारा जारी किये गए उत्पत्ति प्रमाण-पत्र के माध्यम से किया जाता है। अधिकृत अभिकरण से प्राप्त इस उत्पत्ति के प्रमाण-पत्र को प्रस्तुत किये बिना निर्यातक एफटीए के तहत सीमाशुल्क प्रशुल्क अधिमान्यता प्राप्त नहीं कर सकता। 

प्रश्नः एसपीएस और टीबीटी उपाय क्या हैं? क्या वे एफटीए में भी आते हैं?

उत्तरः एसपीएस उपाय ‘‘स्वच्छता और पादपस्वच्छता‘‘ उपायों के लिए उपयोग किया जाने वाला शब्द संक्षेप है, और मोटे तौर पर इसमें वनस्पति, पशु और मानव स्वास्थ्य के संरक्षण के उपाय शामिल होते हैं। टीबीटी ‘‘व्यापार की तकनीकी बाधाओं‘‘ के लिए उपयोग किया जाने वाला शब्द संक्षेप है, और इसमें मोटे तौर पर विश्व व्यापार संगठन के टीबीटी समझौते में परिभाषित मानक, तकनीकी विनियम और अनुरूपता मूल्यांकन प्रक्रियाएं शामिल होते हैं। चूंकि एसपीएस और टीबीटी व्यापार के लिए बाधाएं हो सकते हैं अनेक एफटीए उनसे निपटते हैं। 

प्रश्नः एफटीए में निपटे जाने वाले अन्य गैर-प्रशुल्क उपाय (एनटीएम) क्या हैं?

उत्तरः एफटीए अध्यायों में शामिल किये गए कुछ अन्य गैर-प्रशुल्क उपाय निम्नानुसार हैंः

  1. आवत अनुज्ञप्ति (लाइसेंसिंग) प्रक्रियाएं 
  2. व्यापार दस्तावेजीकरण 
  3. पोत लदान पूर्व निरीक्षण

प्रश्नः सेवा व्यापार के तहत आपूर्ति की चार विधियां कौन सी हैं?

उत्तरः आपूर्ति की चार विधाएं निम्नानुसार हैंः

विधा 1ः सीमा-पार आपूर्ति - (एक पक्ष के प्रदेश से दूसरे पक्ष के प्रदेश में आपूर्ति) उदाहरणार्थ एक वास्तुकार अपनी वास्तुशिल्प योजना इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेज सकता है; एक शिक्षक अपनी शिक्षा सामग्री किसी भी देश के विद्यार्थियों को भेज सकता है; जर्मनी में बैठा एक चिकित्सक भारत के अपने मरीज को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सलाह दे सकता है। इन सभी मामलों में सेवा व्यापार होता है और यह वस्तुओं के सीमा-पार संचार के समकक्ष है। 

विधा 2ः विदेशों में उपभोग - (किसी पक्ष के सेवा उपभोक्ता द्वारा अन्य पक्ष के प्रदेश में उपभोग) उदाहरणार्थ किसी पर्यटक द्वारा विदेश में किया गया होटल या रेस्टॉरेंट सेवा का उपयोग; किसी जहाज या हवाई जहाज की विदेश में होने वाली मरम्मत या रखरखाव सेवा। 

विधा 3ः वाणिज्यिक उपस्थिति - (किसी एक पक्ष के सेवा आपूर्तिकर्ता द्वारा अन्य पक्ष के प्रदेश में वाणिज्यिक उपस्थिति के माध्यम से) इस मामले में सेवा आपूर्तिकर्ता मेजबान देश में संयुक्त उपक्रम/सहायक कंपनी/प्रतिनिधि/शाखा कार्यालय के रूप में कानूनी उपस्थिति स्थापित करता है और सेवाओं की आपूर्ति करना शुरू करता है। उदाहरणार्थ कोई बैंक विदेश में अपनी शाखा खोलती है। 

विधा 4ः प्राकृतिक व्याप्ति की उपस्थिति/संचार - (अन्य पक्ष के प्रदेश में एक पक्ष के प्राकृतिक व्यक्तियों की उपस्थिति के माध्यम से उस पक्ष के सेवा आपूर्तिकर्ता द्वारा) उदाहरणार्थ स्वतंत्र सेवा आपूर्तिकर्ता या आईएसएस (उदाहरणार्थ चिकित्सक, अभियंता, व्यक्तिगत परामर्शदाता, लेखाकार इत्यादि) जो दूसरे देश में सेवाओं की आपूर्ति करते हैं। हालांकि जीएटी केवल अस्थाई संचार को ही शामिल करते हैं न कि स्थाई आधार पर विदेश में नागरिकता, निवास या रोजगार। 

प्रश्नः प्राकृतिक व्यक्तियों की विभिन्न श्रेणियाँ क्या है, और उन्हें किस प्रकार परिभाषित किया जाता है?

उत्तरः प्राकृतिक व्यक्तियों की विभिन्न श्रेणियाँ निम्नानुसार परिभाषित की जाती हैंः

  • संविदात्मक (अनुबंधीय) सेवा आपूर्तिकर्ता (सीएसएस): ‘‘बी‘‘ देश के उपभोक्ता के साथ किये गए सेवा अनुबंध के आधार पर ‘‘ए‘‘ देश का सेवा आपूर्तिकर्ता ‘‘बी‘‘ देश में बिना वाणिज्यिक उपस्थिति के अपने किसी कर्मचारी को सेवा की आपूर्ति करने के लिए ‘‘बी‘‘ देश में भेजता है;
  • इंट्रा-कॉर्पोरेट अंतरिती (आईसीटी): ‘‘ए‘‘ का एक सेवा आपूर्तिकर्ता अपने किसी कर्मचारी का स्थानांतर ‘‘बी‘‘ में स्थापित वाणिज्यिक उपस्थिति में में करता है; 
  • व्यापार आगंतुक (बीवी) और सेवा विक्रेताः ‘‘ए‘‘ देश का सेवा आपूर्तिकर्ता अपने किसी कर्मचारी को या तो वाणिज्यिक उपस्थिति स्थापित करने के उद्देश्य से या अपनी ओर से किसी सेवा के विक्रय की चर्चा करने के लिए ‘‘बी‘‘ देश में भेजता है। व्यापार आगंतुक प्रत्यक्ष रूप से सेवाओं के वितरण में शामिल नहीं होते बल्कि वे मात्र भविष्य के ऐसे व्यापार को सुविधाजनक बनाने के लिए कार्य करते हैं जो आपूर्ति के विभिन्न माध्यमों से हो सकते हैं। 
  • स्वतंत्र पेशेवर (आईपी): ‘‘ए‘‘ देश का कोई सेवा आपूर्तिकर्ता अपनी व्यक्तिगत हैसियत से सेवा की आपूर्ति के लिए देश ‘‘बी‘‘ में जाता है। अतः, वह आपूर्तिकर्ता ऐसी किसी व्यापार इकाई का प्रतिनिधि या कर्मचारी नहीं होता जिसका सेवा अनुबंध है।





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PT's IAS Academy: यूपीएससी तैयारी - अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं - व्याख्यान - 11
यूपीएससी तैयारी - अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं - व्याख्यान - 11
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